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महिला उत्थान मंडल

यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता: ।

‘जहाँ नारी की पूजा होती है, जहाँ उसे सम्मान मिलता है, वहाँ  देवताओं का वास होता है  ।’

भारतीय संस्कृति औऱ धर्मग्रंथों में नारी शक्ति की अपार महिमा गायी गयी है । इसीलिए नारी का स्थान सदैव ऊँचा और सन्माननीय माना गया है । इसके प्रत्यक्ष उदाहरण सती अनसूया, ज्ञान पुंज गार्गी, माता मदालसा, आनंदमई माँ, शारदा माँ जैसी दिव्य नारियाँ और रानी लक्ष्मी बाई, जीजाबाई, रत्नावती जैसी वीरांगनाओं के अभूतपूर्व योगदान को नाकारा नहीं जा सकता है । भारतीय संस्कृति की रक्षा में भी इन देवियों का योगदान सराहनीय रहा है ।

यह बात भी सर्वविदित है कि प्रत्येक सफल व्यक्ति के पीछे नारी की महत्वपूर्ण भूमिका होती है ।  फिर वह चाहे माँ, पत्नी, बहन के रूप में हो या फिर किसी आराध्य देवी के रूप में हो । विदुषी रत्नावली के ज्ञानयुक्त शब्दबाणों के फलस्वरूप उनके पति तुलसीदास में जागृति आई और समाज को श्री रामचरित्रमानस के रचयिता संत तुलसीदास जी मिले । छत्रपति शिवाजी को महान बनाने में माता जीजाबाई का असाधारण योगदान रहा था ।

जिस घर की नारी मधुर भाषिणी, सयंमी-सदाचारी और ईश्वर परायण होती है, वे ही अपने बच्चों को उच्च संस्कार देकर महान आत्मा बना सकती है । इसके कितने ही प्रत्यक्ष उदाहरण हैं । रानी मदालसा ने ब्रह्मज्ञान की लोरिओं से अपने तीनों पुत्रों को बाल्यावस्था में ही ब्रह्मज्ञानी बना दिया और चौथा माँ के दिव्य संस्कारों से आगे चलकर ब्रह्मज्ञानी हो गया । दादी माँ की वेदांती लोरियों ने बालक लीलाराम को ब्रह्मनिष्ठ साईं श्री लीला शाह जी महाराज के रूप में परिणत कर दिया । ऐसे ही माँ महंगीबा की प्रभुध्यान की प्रेरणा ने बालक आसुमल को ब्रह्मज्ञानी संत  श्री आशाराम जी के रूप में विश्व को अद्भुत रत्न प्रदान किया ।

देश व समाज की सर्वांगीण उन्नति के लिए नारी का सर्वगुण सम्पन्न होना अत्यंत आवश्यक है क्योंकि भावी पीढ़ी की जननी वही है ।

अत: नारी-समाज को पुन: अपनी महिमा से अवगत करने, उसके सर्वांगीण विकास का मार्गदर्शन करने तथा मनुष्य जीवन के वास्तविक उद्देश्य भगवतप्राप्ति के प्रति सजग करने के लिए विश्ववंदनीय ब्रह्मनिष्ठ महापुरुष पूज्य संत श्री आशारामजी बापू की पावन प्रेरणा एवं मार्गदर्शन में ‘महिला उत्थान मंडल’ का गठन किया गया ।   

हमारा उद्देश्य -

(1)  समस्त मानवजाति के पथप्रदर्शन का सामर्थ्य रखने वाली सर्वहितकारी सनातन संस्कृति की परंपराओं के महत्व को सम्पूर्ण विश्व के समक्ष उजागर करना ।

(2) नारी जाति के सर्वांगीण (शारीरिक, मानसिक, बौद्धिक व आध्यात्मिक) विकास हेतु नवीन पथों की प्रशस्ति ।

(3)  शिविरों व अनुष्ठानों के आयोजन द्वारा नारियाँ चलें स्व की ओर अर्थात् मनुष्य जन्म के वास्तविक लक्ष्य की ओर ।

(4) पाश्चात्य जगत के अंध पथ की ओर बढ़  रही  युवतियों को तेजस्विता के प्रकाशद्वार तक पहुंचाना ।

(5) पारिवारिक उन्नति हेतु उचित मार्गदर्शन प्रदान कर स्वस्थ-सुखी एवं सम्मानित पारिवारिक जीवन का नियोजन ।

(6) माताओं द्वारा गर्भावस्था के दौरान ही बच्चों में सुसंस्कारों का सिंचन कर उन्नत भावी पीढ़ी का निर्माण ।

(7)  व्यसन, दहेज, तलाक, भ्रूणहत्या, आत्महत्या जैसी सामाजिक कुरीतियों के कारणों को जानकर उनके उचित समाधान समाज को प्रदान करने का प्रयास ।

 (8) नारी शक्ति को पुन: जागृत करना ।

महिला उत्थान मंडल के विभिन्न सेवा प्रकल्प –

  1. चलें स्व की ओऱ... शिविर
  2. दिव्य शिशु संस्कार अभियान
  3. सिजेरियन डिलिवरी से सावधान, गर्भपात से सावधान
  4. तेजस्विनी अभियान
  5. रक्षाबंधन कार्यक्रम
  6. कैदी उत्थान कार्यक्रम
  7. वृंदा (घर-घर तुलसी लगाओ) अभियान
  8. आध्यात्मिक जागरण अभियान

वास्तव में खनिज, वन, पर्वत, नदी आदि देश की सच्ची सम्पत्ति नहीं हैं अपितु ऋषि-परम्परा के पवित्र संस्कारों से सम्पन्न तेजस्वी संतानें ही देश की सच्ची सम्पत्ति हैं और वर्तमान समय में देश को इस सम्पत्ति की अत्यंत आवश्यकता है । शिशु में संस्कारों की नींव माँ के गर्भ में ही पड़ जाती है । इसलिए उत्तम संतानप्राप्ति के इच्छुक दम्पत्तियों को चाहिए कि वे उत्तम संतानप्राप्ति के नियमों को जान लें और शास्त्रोक्त रीति से गर्भाधान कर परिवार, देश व मानवता का मंगल करने वाली महान आत्माओं की आवश्यकता की पूर्ति करें ।

गर्भस्थ शिशु को सुसंस्कारी बनाने तथा उसके उचित पालन-पोषण की जानकारी देने हेतु पूज्य संत श्री आशारामजी बापू द्वारा प्रेरित महिला उत्थान मंडल द्वारा लोकहितार्थ दिव्य शिशु संस्कार अभियान प्रारंभ किया गया है ।

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