गर्भावस्था से पूर्व

गर्भावस्था से पूर्व

  • योगासनों के द्वारा शरीर, मन एवं बुद्धि की शुद्धि होती है और अच्छे स्वास्थ्य को पाया जा सकता है |
  • योगासनों से शरीर, मन व बुद्धि को शान्ति तथा स्थिरता प्राप्त होती है |
  • योगासन से शरीर की सब स्नायुओं, अंतरभाग की इन्द्रियों व ग्रंथियों का भरपूर व्यायाम हो जाता है और फिर ये अधिक कार्यक्षम हो जाती हैं |
  • अंग-अंग फुर्तीला हो जाता है, शरीर हल्का हो जाता है, मन की चंचलता पर अंकुश लगता है |
  • यदि शरीर स्वस्थ होगा तो विचार भी स्वस्थ होंगे | जो आपकी भावी संतान को लाभप्रद साबित होगा |

  • मन: शुद्धि के लिए सर्वप्रथम अपने विचारों पर सतत् निगरानी रखनी चाहिए |
  • क्योंकि मन में जैसे विचार चलते हैं उनसे ही हमारा सारा व्यवहार प्रभावित होता है |
  • इसीलिए टी.वी., सीरियल्स व चलचित्रों से सावधान रहना चाहिए | अश्लील गाने आदि सुनने में रूचि न रखें तो अच्छा है |
  • आरंभ में तो इनके दुष्प्रभाव का आभास हमें नहीं होता | लेकिन इनके द्वारा हमारे मन पर बुरा प्रभाव पड़ता है |
  • आपके अंदर यदि चंचलता तथा विकृत विचारों का बाहुल्य होगा तो उन विचारों से आपकी भावी संतान भी चंचल, कामुक व आपराधिक प्रवृत्ति की हो सकती है |
  • अत: मन: शुद्धि के लिए सत्संग-श्रवण, सत्शास्त्रों का अध्ययन, संत-दर्शन, देव-दर्शन, भगवद्-उपासना पर विशेष ध्यान दें तथा मन को सद्विचारों से ओत-प्रोत रखें | भगवन्नाम का अधिकाधिक मानसिक जप करें | इससे आपकी संतान दैवी सद्गुणों से युक्त होगी | कहा भी गया है, जैसी भूमि वैसी उपज |
  1. उत्तम संतानप्राप्ति हेतु गर्भाधान के उपयुक्त समय का ज्ञान होना अति आवश्यक है ।
  2. ऋतुकाल (रजोदर्शन के प्रथम दिन से 16 वें दिन का काल) के प्रथम तीन दिन मैथुन के लिए सर्वथा निषिद्ध है | साथ ही 11 वीं व 13 वीं रात्रि भी वर्जित है |
  3. उत्तरोत्तर रात्रियों में गर्भाधान पर प्रसवित शिशु की आयु, आरोग्य, सौभाग्य, पौरुष, बल एवं ऐश्वर्य अधिकाधिक होता है |
  4. रजोदर्शन दिन को हो तो वह प्रथम दिन गिनना चाहिए | सूर्यास्त के बाद हो तो सूर्यास्त से सूर्योदय तक के समय के तीन समान भाग कर प्रथम दो भागों में हुआ हो तो उसी दिन को प्रथम दिन गिनना चाहिए | रात्रि के तीसरे भाग में रजोदर्शन हुआ हो तो दूसरे दिन को प्रथम दिन गिनना चाहिए |
  5. पूर्णिमा, अमावस्या, प्रतिपदा, अष्टमी, एकादशी, चतुर्दशी, सूर्यग्रहण, चन्द्रग्रहण, पर्व या त्यौहार की रात्रि, श्राद्ध के दिन, चतुर्मास, प्रदोषकाल (त्रयोदशी के दिन सूर्यास्त के निकट का काल ), क्षय तिथि ( दो तिथियों का समन्वयकाल) एवं मासिक धर्म के तीन दिन समागम नहीं करना चाहिए |
  6. सभी पक्षों की अमावस्या, पूर्णिमा, चतुर्दशी और अष्टमी – इन सभी तिथियों में स्त्री समागम करने से नीच योनी एवं नरकों की प्राप्ति होती है | ( महाभारत, अनुशासन पर्व, दानधर्म : १०४.२१-३०)
  7. माता-पिता की मृत्यु तिथि, स्वयं की जन्म-तिथि, नक्षत्रों की संधि (दो नक्षत्रों के बीच का समय ) तथा अश्विनी, रेवती, भरणी, मघा व मूल इन नक्षत्रों में समागम वर्जित है |
  8. दिन में समागम आयु व बल का बहुत ह्रास करता है, अत: न करें ।
  1. रात्रि के शुभ समय में से भी प्रथम 15 व अंतिम 15 मिनट का त्याग कर के बीच का समय गर्भाधान के लिए निश्चित करें |
  2. दिन में और दोनों संध्याओं के समय जो सोता है या स्त्री-सहवास करता है, वह सात जन्मों तक रोगी और दरिद्र होता है | ( ब्रह्मवैवर्त पुराण, श्री कृष्णजन्म खंड : ७५.८०)
  3. दिन में स्त्री-समागम पुरुष के लिए बड़ा भारी आयु का नाशक माना गया है | (स्कंद पुराण , ब्राह्मखंड, धर्मारण्य माहात्म्य : ६.३५)
  4. शयनगृह हवादार, स्वच्छ, सात्तविक धूप के वातावरण से युक्त हो ।
  5. कमरे में अनावश्यक सामान व काँटेदार पौधे न हों ।
  6. दम्पत्ति सफेद या हल्के रंगवाले वस्त्र पहनें एवं हल्के रंग की चादर बिछायें । इससे प्राप्त प्रसन्नता व सात्त्विकता दिव्य आत्माएँ लाने में सहायक होगी ।
  7. कम से कम तीन दिन पूर्व रात्रि व समय तय कर लेना चाहिए | निश्चित दिन में शाम होने से पूर्व पति-पत्नी को स्नान कर स्वच्छ वस्त्र पहन के सद्गुरु व इष्टदेव की पूजा करनी चाहिए |
  1. दम्पति अपनी चित्तवृत्तियों को परमात्मा में स्थिर करके उत्तम आत्माओं को आह्वान करते हुए प्रार्थना करे : ‘हे ब्रह्मांड में विचरण कर रहीं सूक्ष्मरूपधारी पवित्र आत्माओं ! हम दोनों आपको प्रार्थना कर रहे हैं कि हमारे घर, जीवन व देश को पवित्र तथा उन्नत करने के लिए आप हमारे यहाँ जन्म लेकर हमें कृतार्थ करें | हम दोनों अपने शरीर, मन, प्राण व बुद्धि को आपके योग्य बनायेंगे |’
  1. पुरुष दायें पैर से स्त्री से पहले शय्या पर चढ़े और स्त्री बायें पैर से पति के दक्षिण पार्श्व में शय्या पर चढ़े | तत्पश्चात् निम्नलिखित मन्त्र पढ़ना चाहिए :

अहिरसि आयुरसि सर्वतः प्रतिष्ठाsसि धाता त्वा । दधातु विधाता त्वा दधातु ब्रह्मववर्चसा भव ।

ब्रह्मा बृहस्पतिर्विष्णुः सोमः सूर्यस्तथाsश्विनौ । भगोsथ मित्रावरुणौ वीरं ददतु मे सुतम् ।

‘हे गर्भ ! तुम सूर्य के समान हो, तुम मेरी आयु हो, तुम सब प्रकार से मेरी प्रतिष्ठा हो । धाता ( सबके पोषक ईश्वर ) तुम्हारी रक्षा करें, विधाता ( विश्व के निर्माता ब्रह्मा ) तुम्हारी रक्षा करें । तुम ब्रह्म से युक्त होओ । ब्रह्मा, बृहस्पति, विष्णु, सोम, सूर्य अश्विनीकुमार और मित्रावरुण, जो दिव्य शक्तिरुप हैं, वे मुझे वीर पुत्र प्रदान करें ।’ ( चरक संहिता, शारीरस्थान : ८.८ )

  1. दम्पत्ति गर्भ–विषय में मन लगाकर रहें । इससे तीनों दोष अपने–अपने स्थानों में रहने से स्त्री बीज को ग्रहण करती है । विधिपूर्वक गर्भधारण करने से इच्छानुकूल संतान प्राप्त होती है ।
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