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गर्भिणी की व्याधियों के उपचार

गर्भिणी की व्याधियों के उपचार

        सगर्भावस्था में स्त्री का शरीर अतिशय संवेदनशील होता है अतः उपचार भी सौम्य व सरल होने चाहिए । औषधि मृदु, मधुर, शीतल, सुखकर व कोमल हो, उसका दुष्परिणाम माता व शिशु पर न हो इसका ध्यान रखना अत्यावश्यक है । इस काल में पति व परिजनों को गर्भिणी के साथ प्रिय तथा हितकर व्यवहार करना चाहिए । एन्टीबायोटिक्स, पेनकिलर्स आदि एलोपैथी दवाइयों का उपयोग प्रयासपूर्वक न करें ।

रक्त की कमी (Anemia) 

          अधिकतर माताओं में रक्त की कमी पायी जाती है जो गर्भ के विकास में बाधक है । आयुर्वेद के अनुसार अति खट्टे, खारे, तीखे, मसालेदार पदार्थों का सेवन, विरुद्ध आहार, असात्म्य आहार अर्थात् जो अपने प्रकृति-ऋतु-पाचनशक्ति आदि के अनुकूल नहीं है ऐसे आहार का सेवन तथा चिन्ता, भय, शोक, क्रोध करने से रक्त की कमी होती है, अत इनसे बचें ।

रक्त-वृद्धि हेतु :

* रक्त बढ़ाने के लिए अनार, अंगूर, काली द्राक्ष (black raisins), मुनक्का, किशमिश, अंजीर, खजूर, बादाम, गाय का दूध, आँवले का मुरब्बा, हरी पत्तेदार सब्जियाँ जरुर लें । * भोजन बनाने व दूध गरम करने के लिए लोहे के बर्तनों का उपयोग करें ।

* दोपहर ३ से ५ के बीच २ अनार, १ चुकंदर (beet) व थोड़ा हरा धनियाँ लेकर रस निकाल के पियें ।

* २-३ ग्राम आँवला चूर्ण में १ चम्मच घी व १ चम्मच शहद मिलाकर दिन में २ बार लें अथवा दूध के साथ च्यवनप्राश लें ।

* औषधि कल्पों में ‘ताप्यादि लौह’ अथवा ‘रजत मालती’ की १-१ गोली सुबह-शाम दूध के साथ लें । आश्रम के उपचार केन्द्रों पर उपलब्ध ‘रक्तवर्धिनी वटी’ लें इससे शीघ्रता से रक्त की वृद्धि होती है । हमारे अन्वेषण के अनुसार आयरन की एलोपैथी दवाइयों व इंजेक्शनों से भी यह दवाइयाँ तेजी से कार्य करती हैं तथा निरापद है ।

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