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गर्भधारण के पूर्व के कर्तव्य

 

दम्पत्ति की स्थिति शारीरिक थकान व मानसिक तनाव से मुक्त हो। परिवार में वाद-विवाद या अचानक मृत्यु की घटना न घटी हो। मन, शरीर व वातावरण स्वस्थ व स्वच्छ हो। आध्यात्मिकता बढ़े इसलिए दोनों से लम्बे, गहरे श्वास लें। भगवत्कृपा, आनंद, प्रसन्नता, ईश्वरीय ओज को भीतर भर के श्वास रोकें, मन में सद्विचार लायें। भगवन्नाम जपते हुए मलिनता, राग-द्वेष आदि अपने मानसिक दोष याद कर फूँक मारते हुए उन्हें श्वास के साथ बाहर फेंके। गर्भाधान के पूर्व 5 से 7 दिन रोज 7 से 10 बार यह प्रयोग करें। शयनगृह हवादार, स्वच्छ, सात्त्विक धूप के वातावरण से युक्त हो। कमरे में अनावश्यक सामान व काँटेदार पौधे न हों। कमरे में अपने गुरुदेव, इष्टदेव या महापुरुषों के श्रीचित्र लगायें तथा रेडियो  व फिल्मों से दूर रहें। दम्पत्ति सफेद या हलके रंगवाले वस्त्र पहनें एवं हलके रंग की चादर बिछायें। इससे प्राप्त प्रसन्नता व सात्त्विकता दिव्य आत्माएँ लाने में सहायक होगी।

कम से कम तीन दिन पूर्व रात्रि व समय तय कर लेना चाहिए। निश्चित दिन में शाम होने से पूर्व पति-पत्नी को स्नान कर स्वच्छ वस्त्र पहन के सद्गुरु व इष्टदेव की पूजा करनी चाहिए।

दम्पत्ति अपनी चित्तवृत्तियों को परमात्मा में स्थिर करके उत्तम आत्माओं को आह्वान करते हुए प्रार्थना करें- 'हे ब्रह्माण्ड में विचरण कर रहीं सूक्ष्मरूपधारी पवित्र आत्माओ ! हम दोनों आपको प्रार्थना कर रहे हैं कि हमारे घर, जीवन व देश को पवित्र तथा उन्नत करने के लिए आप हमारे यहाँ जन्म लेकर हमें कृतार्थ करें। हम दोनों अपने शरीर, मन, प्राण व बुद्धि को आपके योग्य बनायेंगे।'

पुरुष दायें पैर से स्त्री से पहले शय्या पर चढ़े और स्त्री बायें पैर से पति के दक्षिण पार्श्व में शय्या पर चढ़े। तत्पश्चात् निम्नलिखित मंत्र पढ़ना चाहिए।

अहिरसि आयुरसि सर्वतः प्रतिष्ठाऽसि धाता त्वा

दधातु विधाता त्वा दधातु ब्रह्मववर्चसा भव।

ब्रह्मा बृहस्पतिर्विष्णुः सोमः सूर्यस्तथाऽश्विनौ।

भगोऽथ मित्रावरुणौ वीरं ददतु मे सुतम्।

'हे गर्भ ! तुम सूर्य के समान हो, तुम मेरी आयु हो, तुम सब प्रकार से मेरी प्रतिष्ठा हो। धाता (सबके पोषक ईश्वर) तुम्हारी रक्षा करें, विधाता (विश्व के निर्माता ब्रह्मा), तुम्हारी रक्षा करें। तुम ब्रह्म से युक्त होओ। ब्रह्मा, बृहस्पति, विष्णु, सोम, सूर्य, अश्विनीकुमार और मित्रावरुण, जो दिव्य शक्तिरूप हैं, वे मुझे वीर पुत्र प्रदान करें।' (चरक संहिता, शारीरस्थानम्- 8.8)

दम्पत्ति गर्भ-विषय में मन लगाकर रहें। इससे तीनों दोष अपने-अपने स्थानों में रहने से स्त्री बीज को ग्रहण करती है। विधिपूर्वक गर्भधारण करने से इच्छानुकूल संतान प्राप्त होती है।

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