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परदुःखकातरता और सच्चाई

 

गाँधी जी का बाल्यकाल बड़ा ही प्रेरणादायक रहा है। उनके जीवन में बचपन से लेकर अंतिम क्षणों तक अनेकों ऐसे संस्मरण हैं, जिनसे प्रत्येक व्यक्ति कुछ-न-कुछ सीख सकता है। गाँधी जी का बचपन का नाम मोहनदास था। मोहनदास अपने पिता की खूब सेवा करते थे। विद्यालय का समय पूरा होने पर वे सीधा घर आ जाते और पिता की सेवा में लग जाते।

एक बार उनके पिताजी श्री करमचंद गाँधी बीमार पड़ गये। मोहनदास उन्हें समय पर दवा देते, हर प्रकार की देखरेख करते और रात को सोते समय देर तक पाँव दबाते। पिताजी उनकी सेवा से खूब प्रसन्न थे और स्नेहभरे आशीर्वाद दिया करते थे।

एक बार मोहनदास घर में बैठकर पढ़ाई कर रहे थे। उनके भाई ने आकर उन्हें बताया कि उस पर 25 रूपये उधार हो गये हैं। इस कर्जे को चुकाने के लिए वह मोहनदास की मदद चाहता था। मोहनदास के पास पैसे तो थे नहीं, वे देते कैसे ? अंततः उन्होंने एक तरकीब निकाली। रात्रि के समय मोहनदास ने अपने दूसरे भाई के बाजूबंद में से थोड़ा-सा सोना निकाल लिया और उसे सुनार के यहाँ बेचकर 25 रूपये भाई को दे दिये। इस प्रकार उनका भाई तो कर्जमुक्त हो गया परंतु चोरी करने के अपराध से मोहनदास का दिल दबा-दबा सा रहने लगा। भोजन, खेलकूद, पढ़ाई आदि सभी क्रियाओं से उनका मन उचाट हो गया। वे बेचैन हो उठे। उन्होंने अपने पिता जी को एक पत्र लिखा और धीरे से उन्हें पकड़ा दिया व पास ही पलंग पर स्वयं बैठ गये। पत्र में मोहनदास ने अपनी गलती स्वीकार की थी और पिताजी से कठोर-से-कठोर दंड देने का निवेदन किया था। पिताजी ने उनका पत्र पढ़ा। पत्र पढ़ते-पढ़ते उनकी आँखों से आँसू बहने लगे। उन्हें अपने सुयोग्य पुत्र पर गर्व हो रहा था। ये आँसू मोहनदास की सच्चाई का प्रमाण दे रहे थे। पिता की अश्रुधारा ने मोहन के हृदय की मैल को धो बहाया। अपनी सच्चाई, ईमानदारी और परदुःखकातरता के कारण यही बालक आगे चलकर महात्मा गाँधी के नाम से प्रसिद्ध हुआ।

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