गर्भावस्था के दौरान

गर्भावस्था के दौरान

आचार्य चरक कहते हैं : “गर्भिणी माता जो अन्न सेवन करती है उसके सार के एक अंश से माता का पोषण होता है, दूसरे से स्तन्य (दूध) निर्माण की प्रक्रिया सक्रिय होती है एवं तीसरा अंश गर्भ का पोषण करता है । अत: गर्भवती ताजे, मधुर रसयुक्त, रूचि के अनुकूल, स्निग्ध अर्थात् घी, मक्खन, तेल आदि से युक्त और जठराग्नि प्रदीपक अर्थात् पाचनशक्ति को बढ़ानेवाले सात्त्विक आहार का सेवन करे । यहाँ मधुर रसयुक्त पदार्थों का लक्ष्यार्थ चीनी, गुड़ से बने व्यंजन नहीं हैं अपितु जिन पदार्थों में ग्लूकोज, फ्रक्टोज, लैक्टोज आदि प्राकृतिक शर्करायें विद्यमान होती हैं ऐसे अनाज, फल, दूध, शहद आदि अभिप्रेत हैं । रूचि के अनुकूल अर्थात् नीचे दिये गये हितकारी पदार्थों को विधि-विधान के अनुसार ऐसे मनोनुकूल बनायें कि शरीर की पुष्टि के साथ-साथ मन का प्रीणन (तुष्टि) भी हो ।”

आहारशुद्धौ सत्वशुद्धि: ...

आहार की शुद्धि से मन की शुद्धि होती है । अत: बालक में दैवी गुणों का सिंचन करने की कामना रखनेवाली माताओं को तमोगुणी पदार्थों का त्याग कर सात्त्विक पदार्थों का ही सेवन करना चाहिए । 

आहार के समान ही माता के द्वारा किये गये विहार अर्थात् आचरण का भी गहरा प्रभाव गर्भस्थ शिशु के मन, बुद्धि व शरीर पर पड़ता है । इसलिए गर्भिणी को शास्त्र निर्दिष्ट सद्वृत्त का पालन कर सदा शांत, प्रसन्‍न, पवित्र तथा भगवद्-उपासना एवं शुभ कार्यों में रत रहना चाहिए तथा उठने-बैठने-सोने आदि में भी विशेष सावधानी रखनी चाहिए ।

सद्वृत्त पालन

        गर्भिणी को सूर्योदय से पहले उठकर स्नानादि से निवृत्त होकर तुलसी, गौमाता, भगवान तथा गुरुजनों की पूजा करनी चाहिए । भगवन्नाम-जप द्वारा मन को तथा सद्विचारों द्वारा बुद्धि को पवित्र रखना चाहिए, इससे संतान दैवी सद्गुणों से युक्त होगी । सच्चे संत पुरुष का दर्शन और ब्रह्मज्ञान का सत्संग मिल जाय तो माता एवं होनहार बालक के भाग्य का कहना ही क्या ....! सत्संग-श्रवण और ध्यान-भजन का उदरस्थ शिशु के चित्त पर अलौकिक व असाधारण प्रभाव पड़ता है ।

        भगवद्-भक्तों, आत्मज्ञानी संत-महापुरुषों और शूरवीरों के जीवन-चरित्र पढ़े-सुनें । श्रीमद् भगवद्गीता, श्रीमद्भागवत का तीसरा और ग्यारहवाँ स्कंध, महाभारत का शांतिपर्व, तुलसीकृत रामायण, भक्तमाल तथा पूज्य बापूजी के अमृत वचनों से युक्त सद्‍ग्रंथ पढ़कर उनका चिंतन-मनन करें ।

        मन में उद्वेग, अशांति, विकार उत्पन्न करनेवाले बीभत्स दृश्य, सिनेमा, टी.वी. सीरियल्स, समाचार पत्र, मैगजीनों को देखते-पढ़ते समय होनेवाली विकृत मनोदशा का गहरा दुष्प्रभाव गर्भस्थ शिशु के चित्त पर पड़ता है, अत: भूलकर भी इन्हें देखें-पढ़ें नहीं । पूज्य बापूजी के जीवन पर आधारित ‘चेतना के स्वर’, सत्यवादी राजा हरिश्चंद्र, संत मीराबाई, संत ज्ञानेश्वर, संत तुकाराम आदि महापुरुषों के जीवन चरित्र पर बने आदर्श चलचित्र व सत्साहित्य देख-पढ़ सकते हैं । 

        काम, क्रोध, शोक, मोह, लोभ, दम्भ, भय आदि मन के विकारों से बचें । आयुर्वेद के अनुसार कलिप्रिय (हिंसा करनेवाली) व कलहप्रिय (विवाद, झगड़ा करनेवाली) स्त्री मानसिक रोग (अपस्मार-Epilepsy) से युक्त; क्रोध करनेवाली स्त्री क्रोधी व कपटी; द्रोही स्त्री दुष्ट तथा निरंतर शोकग्रस्त रहनेवाली स्त्री कृश (दुबले-पतले), अल्पायु, डरपोक संतान को जन्म देती है । अत: दिव्य संतान प्राप्ति की कामनावाली मातायें मन उद्विग्न, खिन्न हो ऐसा कोई कार्य न करें । अप्रिय लगे ऐसी बात न सुनें, न करें  । वाद-विवाद में न पड़ें,  बीती हुई बातों को याद कर-कर के शोक न करें । प्रयत्नपूर्वक क्षमा, शांति, आनंद, विवेक, संतोष, निष्कपटता, अहिंसा, सत्यवादिता, निर्भयता आदि दैवी गुणों का अवलम्बन लें । सबके साथ प्रेम व हितभरा व्यवहार करें, उसीमें अपना वास्तविक हित निहित है । व्यवहार में मधुरता लाने के लिए आश्रम से प्रकाशित मधुर व्यवहार पुस्तिका पढ़ा करें इससे बालक को गर्भावस्था से ही मधुर व्यवहार की सीख मिलेगी ।

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