आयुर्वेद के ग्रंथों में हमारे ऋषियों व आचार्यों द्वारा गर्भिणी-परिचर्या (गर्भावस्था के दौरान देखभाल) बताई गई है । जिसमें नौ मास की गर्भावस्था के दौरान गर्भवती महिला के लिए प्रत्येक मास में सेवन करने योग्य निश्चित औषधियों का संयोजन वर्णित किया है । इसके अनुसार औषधियों का सेवन करने से गर्भस्राव व गर्भपात की संभावना टलती है । इसमें माता के भीतर हो रहे परिवर्तन व बालक के विकास के लिए आवश्यक पहलु को ध्यान में रखते हुए गर्भस्थ शिशु के संपूर्ण विकास के लिए आवश्यक सभी तत्वों को सम्मिलित किया गया है । जिसे आधुनिक लोग प्रोटीन, कार्बोहाइड्रेट, फोलिक, कैल्शियम, आयरन, कॉपर, जिंक, फॉस्फेट व विविध विटामिन्स, मिनरल्स इत्यादि कहते हैं ।
इतना ही नहीं, सातवें मास से माता में बी.पी., खून की कमी, कमजोरी इत्यादि विशेष रूप से होनेवाली समस्याओं पर भी गौर करके मासानुमास औषधियों का ज्ञान प्राचीनकाल से आचार्यों ने वर्णित किया है । ये हमारे भारतीय आयुर्वेद के गहन अध्ययन को दर्शाता है ।
आयुर्वेदिक Products
गर्भामृत कल्प व गर्भामृत वटी नं. 1/2/3 –
गर्भावस्था के नौ मास को हमने तीन भाग में बांटा है :-

गर्भामृत कल्प व गर्भामृत वटी नं. – 1 –
गर्भावस्था के प्रथम तीन मास । पहला, दूसरा, तीसरा

गर्भामृत कल्प व गर्भामृत वटी नं. – 2 -
गर्भावस्था का चौथा, पांचवा, छठवां मास ।
गर्भामृत कल्प व गर्भामृत वटी नं. – 2 -
गर्भावस्था का चौथा, पांचवा, छठवां मास ।


गर्भामृत कल्प व गर्भामृत वटी नं. – 3 -
गर्भावस्था के अंतिम तीन मास – सातवां, आठवां और नंवा मास ।
इस प्रकार आचार्यों द्वारा वर्णित औषधियों को गर्भामृत कल्प व गर्भामृत वटी दोनों रूप में सुगमता से ले सके उस रूप में बनाया है । किसी कारणवश यदि दूध न ले सके तो इसे गुनगुने पानी में घोलकर भी ले सकती हैं । किसीको चॉकलेट फ्लेवर अनुकूल नहीं हो तो गोली पानी से ले सकती हैं । कुल मिलाकर गर्भवती महिला किसी भी तरह से औषधि सेवन करके स्वयं को पोषित व बालक के विकास में सहायक बन सकती है ।
इनमें श्रृंगाटक, मुलेठी, जीवंती, शतावरी, विदारी दूर्वा, कमल के बीज आदि कई औषधियाँ डाली गई हैं ।
शिशु पुष्टिकर नस्य
गर्भधारणा से पूर्व व गर्भावस्था के प्रथम तीन मास तक नाक में औषधि सिद्ध घृत का नस्य लेने से बालक पुष्ट व स्वस्थ होता है । इसी की गोली भी वैद्य के अनुसार सेवन करने से शिशु स्वस्थ व पुष्ट होता है ।


शिशु पुष्टिकर नस्य
गर्भधारणा से पूर्व व गर्भावस्था के प्रथम तीन मास तक नाक में औषधि सिद्ध घृत का नस्य लेने से बालक पुष्ट व स्वस्थ होता है । इसी की गोली भी वैद्य के अनुसार सेवन करने से शिशु स्वस्थ व पुष्ट होता है ।

रक्षा पोटली
सातवें मास से इसे शुभ मुहूर्त में धारण करने से गर्भिणी की ओरा नौ मीटर बढ़ जाती है जिससे माँ और बालक की रक्षा होती है ।


अन्य दवाएं
1) कैल्शियम व उल्टी की तीन–चार प्रकार की व आयरन, रक्त की कमी के लिए दो प्रकार की दवाएं हैं जो गर्भिणी की प्रकृति को देखकर दी जाती हैं ।
2) कमजोरी व थायरॉयड आदि के लिए भी आयुर्वेदिक दवाएं दी जाती हैं ।

उल्टी निवारक अवलेह व वटी व चूर्ण
गर्भावस्था के दौरान गर्भिणी को सामान्यतः उल्टी आने लगती है । परंतु ये उल्टी लंबे समय तक या बार-बार होने लगती है तो गर्भिणी उल्टी, उबकाई के कारण सम्यक् भोजन नहीं ले पाती । इन समस्याओं के निवारणार्थ अवलेह, वटी व चूर्ण हैं । जो वैद्यकीय सलाहानुसार गर्भिणी की प्रकृति व नाजुकता को देखकर दिया जाता है ।

सुलभ प्रसूति तैल
गर्भावस्था के सातवें महीने से ही इस तेल की मालिश गर्भिणी को पूरे शरीर पर करना होता है । यदि ये संभव न हो पाए तो छाती, पेट, कमर, कूल्हे, जांघ व घुटनों पर नित्य प्रतिदिन करनी चाहिए । खासकर जब पेट पर मालिश करें तब पुस्तक में दिए गए दोनों मंत्रों का उच्चारण करते हुए करें । सप्तम मास में उदरस्थ बालक संपूर्ण विकसित हो जाने से माँ के सभी स्थानीय अवयव व त्वचा अपने मूल रूप से ज्यादा बढ़ गई होती है । ऐसी अवस्था में खुजली, शुष्कता व किसी–किसी को थकावट महसूस होती है । हमारे शास्त्रकारों ने ऐसी परिस्थितियों के निवारणार्थ स्थानीय मालिश करने का कहा है। पेशीयां औषधीय सिद्ध तेल की मालिश करने से बलवान व मृदु होती है । इस प्रकार डिलिवरी तक करने से पेशीयों में लचीलापन व बल आ जाने से प्रसूति काल में उठती वेदना (लेबरपेन) वो सह पाती है । साथ ही इस तेल में डुबोया हुआ फाहा योनि के अंदर रोज रात को रखना होता है । इससे बालक के आने वाला पथ भी लचीला व वायु अनुलोमन वाला होने से बालक की सुलभ प्रसूति हो जाती है ।
सुलभ प्रसूति तैल
गर्भावस्था के सातवें महीने से ही इस तेल की मालिश गर्भिणी को पूरे शरीर पर करना होता है । यदि ये संभव न हो पाए तो छाती, पेट, कमर, कूल्हे, जांघ व घुटनों पर नित्य प्रतिदिन करनी चाहिए । खासकर जब पेट पर मालिश करें तब पुस्तक में दिए गए दोनों मंत्रों का उच्चारण करते हुए करें । सप्तम मास में उदरस्थ बालक संपूर्ण विकसित हो जाने से माँ के सभी स्थानीय अवयव व त्वचा अपने मूल रूप से ज्यादा बढ़ गई होती है । ऐसी अवस्था में खुजली, शुष्कता व किसी–किसी को थकावट महसूस होती है । हमारे शास्त्रकारों ने ऐसी परिस्थितियों के निवारणार्थ स्थानीय मालिश करने का कहा है। पेशीयां औषधीय सिद्ध तेल की मालिश करने से बलवान व मृदु होती है । इस प्रकार डिलिवरी तक करने से पेशीयों में लचीलापन व बल आ जाने से प्रसूति काल में उठती वेदना (लेबरपेन) वो सह पाती है । साथ ही इस तेल में डुबोया हुआ फाहा योनि के अंदर रोज रात को रखना होता है । इससे बालक के आने वाला पथ भी लचीला व वायु अनुलोमन वाला होने से बालक की सुलभ प्रसूति हो जाती है ।


सुलभ प्रसूति वटी व चूर्ण
यह गोली डिलीवरी के समय लेने से प्रसूति सरलता से हो जाती है । जब हॉस्पिटल में डिलीवरी के लिए ले जाए, पानी छूट गया हो (वाटर बैग ब्रेक हो गई हो) तब ये एक गोली पानी से लेकर जाए । यदि किसी को गोली लेने से निर्धारित परिणाम न मिले तो एक पावडर भी है जो शहद से गोली के आधे घंटे बाद लेना होता है । इस प्रकार वैद्यकीय सलाह अनुसार सेवन करने से सुगमतापूर्वक प्रसव हो जाता है ।

बालान्तक तेल
प्रसव के तुरंत बाद माता (सूतिका) की इस तेल से सवा महिने तक मालिश करने से सूतिका के शरीर में बढ़ी हुई वायु, थकान का निर्हरण होकर शरीर पुन: अपने प्राकृत बल को प्राप्त करने लगता है । इस तेल में उपयुक्त पृश्नपर्णी, बिल्व, पाटला, शीवण आदि औषधियों का आयोजन ही इस प्रकार का है कि माता का शरीर पुन: पुष्ट होने लगता है । गर्भाशय व उदर की मांसपेशियां धीर-धीरे संकुचित होकर अपने मूल रूप में आने लगती हैं ।
विधि :- कटोरी में तेल लेकर कटोरी को गर्म पानी के बर्तन में रखें । तेल गुनगुना हो जाए तब कर्णपूरण, नाभिपूरण करके प्रतिलोम दिशा में अर्थात् नीचे से ऊपर की ओर मालिश करें । विशेष रूप से पेट, छाती व कमर पर मालिश करें ।
सावधानी : –
1. मालिश के समय कमरे में सीधी हवा न आये साथ ही कमरे का तापमान ठंडा न हो इसका ध्यान रखें ।
2. ऑपरेशन करना पड़ा हो तो वैद्य की सलाह से मालिश कैसे और कब करना चाहिए ये जान लें ।
3. हाई ब्लडप्रेशर हो तो मालिश अनुलोम अर्थात् ऊपर से नीचे की ओर करें ।
4. मालिश के बाद गर्म पानी से स्नान करें ।
5. स्नान के बाद कान पर स्काफ बांध लें तथा भोजन के तीन घंटे बाद पेट पर चौड़ा पट्टा बांध लें ।
बालान्तक तेल
प्रसव के तुरंत बाद माता (सूतिका) की इस तेल से सवा महिने तक मालिश करने से सूतिका के शरीर में बढ़ी हुई वायु, थकान का निर्हरण होकर शरीर पुन: अपने प्राकृत बल को प्राप्त करने लगता है । इस तेल में उपयुक्त पृश्नपर्णी, बिल्व, पाटला, शीवण आदि औषधियों का आयोजन ही इस प्रकार का है कि माता का शरीर पुन: पुष्ट होने लगता है । गर्भाशय व उदर की मांसपेशियां धीर-धीरे संकुचित होकर अपने मूल रूप में आने लगती हैं ।
विधि :- कटोरी में तेल लेकर कटोरी को गर्म पानी के बर्तन में रखें । तेल गुनगुना हो जाए तब कर्णपूरण, नाभिपूरण करके प्रतिलोम दिशा में अर्थात् नीचे से ऊपर की ओर मालिश करें । विशेष रूप से पेट, छाती व कमर पर मालिश करें ।
सावधानी : –
1. मालिश के समय कमरे में सीधी हवा न आये साथ ही कमरे का तापमान ठंडा न हो इसका ध्यान रखें ।
2. ऑपरेशन करना पड़ा हो तो वैद्य की सलाह से मालिश कैसे और कब करना चाहिए ये जान लें ।
3. हाई ब्लडप्रेशर हो तो मालिश अनुलोम अर्थात् ऊपर से नीचे की ओर करें ।
4. मालिश के बाद गर्म पानी से स्नान करें ।
5. स्नान के बाद कान पर स्काफ बांध लें तथा भोजन के तीन घंटे बाद पेट पर चौड़ा पट्टा बांध लें ।


बालान्तक काढ़ा
डिलीवरी के तुरंत बाद से सवा मास तक यह काढ़ा माँ को सुबह खाली पेट एक बार देने से माँ का दूध व गर्भाशय शुद्ध होता है तथा माँ शीघ्रता से प्रसूति के बाद हुई कमजोरी से जल्दी ठीक हो जाती है ।

शिशु बल्य तेल
आयुर्वेद ग्रंथों में वर्णित तेल में आज के खान-पान को ध्यान में रखकर अनुभवी वैद्य के द्वारा कुछ विशेष औषधियों को सम्मिलित करके इस तेल का निर्माण किया गया है । जैसे – शतपुष्पा, मंजीठ, वायविंडग, नीशा, गुड़हल फूल, रक्तचंदन आदि औषधियों के साथ बकरी का दूध डाला गया है । आजकल बाजार में विविध कंपनियों के तेल उपलब्ध हैं, जिनमें अप्राकृतिक रंग व सुगंध का प्रयोग होता है । जो दिखने में सुहावने शायद नजर आते भी हो परंतु नवजात शिशु के लिए औषधियों का आयोजन व निर्माण प्रायः इतनी बारीकी से नहीं किया जाता है ।
लाभ :- नवजात शिशु को जन्म के प्रथम दिन से ही प्रतिदिन नियमित मालिश करने से संपूर्ण शरीर में रक्त-संचारण सुचारू रूप से होता है और विटामिन डी बनने में मदद मिलती है । शिशु की त्वचा में मृदुता व अंगों में लचीलापन आता है। सारे अंगों का व्यायाम हो जाने से बालक हृष्ट–पुष्ट व कमलदल के समान सुविकसित होने लगता है ।
विधि :- कटोरी में आवश्यक मात्रा में तेल लें । गर्म पानी के बर्तन में कटोरी रखकर तेल हल्का गुनगुना करें। सर्वप्रथम सिर में तालु पर हल्के हाथ से मालिश करें । इसके पश्चात् दोनों पैरों के तलवे, पंजे, दोनों पैर, दोनों हाथ पर करते हुए पेट पर घड़ी की दिशा में घुमाते हुए आगे छाती, गर्दन, मुख पर मालिश करें । फिर शिशु को पेट के बल लिटाकर गर्दन, पीठ, मेरूदंड, निंतब, पैर पर मालिश करें । मालिश के बाद आधा-एक घंटे के बाद किसी भी प्रकार के साबुन व शैम्पू का उपयोग न करके बेसन (चने का आटा), हल्दी व कच्चा दूध मिलाकर बनाए घोल से ही बालक को स्नान कराएं ।
सावधानी :-
1) शिशु को किसी भी प्रकार के बेबी सोप व शैम्पू से स्नान न कराएं । इससे उसकी सुकोमल त्वचा व रोमकूप पर केमिकल का दुष्प्रभाव हो सकता है ।
2) शिशु ज्वर, दस्त, कफ इत्यादि के कारण अस्वस्थ है तो उस समय मालिश न करें ।
शिशु बल्य तेल
आयुर्वेद ग्रंथों में वर्णित तेल में आज के खान-पान को ध्यान में रखकर अनुभवी वैद्य के द्वारा कुछ विशेष औषधियों को सम्मिलित करके इस तेल का निर्माण किया गया है । जैसे – शतपुष्पा, मंजीठ, वायविंडग, नीशा, गुड़हल फूल, रक्तचंदन आदि औषधियों के साथ बकरी का दूध डाला गया है । आजकल बाजार में विविध कंपनियों के तेल उपलब्ध हैं, जिनमें अप्राकृतिक रंग व सुगंध का प्रयोग होता है । जो दिखने में सुहावने शायद नजर आते भी हो परंतु नवजात शिशु के लिए औषधियों का आयोजन व निर्माण प्रायः इतनी बारीकी से नहीं किया जाता है ।
लाभ :- नवजात शिशु को जन्म के प्रथम दिन से ही प्रतिदिन नियमित मालिश करने से संपूर्ण शरीर में रक्त-संचारण सुचारू रूप से होता है और विटामिन डी बनने में मदद मिलती है । शिशु की त्वचा में मृदुता व अंगों में लचीलापन आता है। सारे अंगों का व्यायाम हो जाने से बालक हृष्ट–पुष्ट व कमलदल के समान सुविकसित होने लगता है ।
विधि :- कटोरी में आवश्यक मात्रा में तेल लें । गर्म पानी के बर्तन में कटोरी रखकर तेल हल्का गुनगुना करें। सर्वप्रथम सिर में तालु पर हल्के हाथ से मालिश करें । इसके पश्चात् दोनों पैरों के तलवे, पंजे, दोनों पैर, दोनों हाथ पर करते हुए पेट पर घड़ी की दिशा में घुमाते हुए आगे छाती, गर्दन, मुख पर मालिश करें । फिर शिशु को पेट के बल लिटाकर गर्दन, पीठ, मेरूदंड, निंतब, पैर पर मालिश करें । मालिश के बाद आधा-एक घंटे के बाद किसी भी प्रकार के साबुन व शैम्पू का उपयोग न करके बेसन (चने का आटा), हल्दी व कच्चा दूध मिलाकर बनाए घोल से ही बालक को स्नान कराएं ।
सावधानी :-
1) शिशु को किसी भी प्रकार के बेबी सोप व शैम्पू से स्नान न कराएं । इससे उसकी सुकोमल त्वचा व रोमकूप पर केमिकल का दुष्प्रभाव हो सकता है ।
2) शिशु ज्वर, दस्त, कफ इत्यादि के कारण अस्वस्थ है तो उस समय मालिश न करें ।


शतावरी कल्प
दूध बढ़ाने हेतु उत्तम औषधि है ।

सूक्ष्म कफहर योग
नवजात बालक को ऋतु परिवर्तन, अपचन, दांत निकलते समय या अन्य किसी भी कारण से जो बुखार सर्दी-जुकाम-निमोनिया हो जाता है, तब ये दवा दी जाती है । अंग्रेजी सीरप देने की आवश्यकता नहीं पड़ती ।
सूक्ष्म सुवर्णप्राश
नवजात बालक के जन्म के प्रथम दिन से ही यह दवा चुटकी दी जाती है । इसमें शहद दूध या पानी की जरूरत नहीं पड़ती । दवा सुस्वादु होने से सहज ही चाट लेता है । शिशु की बढ़ती उम्र में इसका प्रमाण भी बढ़ाया जाता है ।
सूक्ष्म दस्त हर कोर्स
नवजात शिशु को दांत आने के समय व अपचन से होते दस्त में ये पावडर देने से राहत हो जाती है । अंग्रेजी दवा नहीं देनी पड़ती ।
सूक्ष्म KKR
गर्भावस्था के दौरान,
1) किसी भी कारणों से बालक के उदर में सम्यक पोषण न हो पाया हो
2) शारीरिक व मानसिक रूप से कमजोर बालक जन्मा हो तब शिशु को यह शुभक्ष्म औषध योग्य मात्रा में देने से बालक स्वस्थ होने लगता है।
सूक्ष्म ज्वरनाशक
नवजात शिशु को कफ/अपचन से यदि बुखार आ जाये तो अंग्रेजी दवा का सीरप न पिलाकर चुटकीभर यह सुस्वादु शूक्ष्म ओषध देने से समस्या का निवारण हो जाता है।
विशेष : आश्रम के वैध से संपर्क करें ।
दुग्ध पाचक चूर्ण
प्रसूति के बाद यदि माता को पर्याप्त दूध न आता हो तब बाहर का दूध शिशु को देना पडता है । ऐसे संकट के समय मे निम्न विधि से ये पाचक चूर्ण को डालकर बनाया दूध शिशु को देना चाहिए ।
विधी
1) छः मास के अंदर का शिशु हो तो बकरी/ गाय/ या थैली /डेरी इनमें से जो भी दूध देना ही पड़े तो उसमे दोगुना पानी मिला दे । अब जितना दूध शिशु के लिए दो तीन बार का बनाना हो वो पतीली मे लेकर उपरोक्त पाचक चूर्ण को मिलाकर कुछ देर उबलने दे आवश्यकतानुसार मिश्री मिलाकर शिशु को दे ।
2) छः मास से एक वर्ष के बालक मे बकरी/ गाय/ डेरी थैली का दूध देना पडे तो उसमे समान मात्रा मे पानी मिला ले । एवं जितना दूध बालक के लिए बनाना हो उसमे उचित मात्रा मे पाचक चूर्ण डालकर कुछ देर उबालकर मिश्री डालकर बालक को दे ।
विशेष बकरी का दूध जन्म से एक वर्ष तक के बालक के लिए श्रेष्ठ है । अन्य (गाय भैंस डेरी के दूध )से
दुग्धवर्धक पावडर
प्रसूति के बाद,
1) माता को ठीक से दूध न आता हो
2) बालक को दूध पीने के बाद गैस, कब्ज, अपचन इन तीनों में से कुछ भी होता हो
3) बालक माता का दूध मुंह में लेता ही न हो तब,
उपरोक्त तीनों कारणों में से कोई भी कारण हो तब यह पावडर दिन में दो से तीन एक आइस्क्रीम चम्मच भरकर पानी के साथ लेने से समस्या का निवारण हो जाता है ।
यहाँ दी गई दवाइयों को प्राप्त करने के लिए संपर्क करें - 07961210888
Views: 337