कल्याणकारक सुवर्णप्राश

       आचार्य चरक कहते हैं कि गर्भिणी के आहार का आयोजन तीन बातों को ध्यान में रखते हुए करना चाहिए – गर्भवती के शरीर का पोषण, स्तन्यनिर्मिती की तैयारी व गर्भ की वृद्धि । माता यदि सात्विक, संतुलित, पथ्यकर एवं सुपाच्य आहार का विचारपूर्वक सेवन करती है तो बालक सहज ही हृष्ट-पुष्ट होता है । प्रसव भी ठीक समय पर सुखपूर्वक होता है ।

      चौथे महीने में बालक के मस्तिष्क की वृद्धि होने लगती है | इसलिये बालकों के बौद्धिक व मानसिक विकास तथा ज्ञानेन्द्रियों के बलवर्धन के लिए, शुद्ध सुवर्ण के साथ ब्राह्मी, ज्योतिष्मति, वचा आदि मेध्य-रसायन (Intelligence Enhancer) औषधियों से युक्त सुवर्णप्राश* सुबह-शाम दूध अथवा शहद के साथ लेना हितकर है । पाँचवे महीने में मन संवेदनशील होता है । अनुवांशिक मानसिक रोगों (ADHD, Autism, Epilepsy, Schizophrenia, etc.) का इतिहास जिन परिवारों में है उन माताओं को शिशु की रक्षा हेतु ‘सुवर्णप्राश’ तथा ‘पंचामृत’ का सेवन अवश्य करना चाहिए । यह एक उत्तम गर्भपोषक है । इसमें उपस्थित शुद्ध केसर बालक के वर्ण में निखार लाता है । गर्भवती महिलाएँ प्राणिजन्य कैल्शियम, लोह, जीवनसत्त्वों (विटामिन्स) की गोलियों के स्थान पर अगर सुवर्णप्राश का प्रयोग करें तो वे स्वस्थ, तेजस्वी-ओजस्वी व मेधावी संतान को जन्म दे सकती हैं ।

      आयुर्वेद के श्रेष्ठ ग्रंथ ‘अष्टांगहृदय’ तथा ‘कश्यप संहिता’ में १६ संस्कारों के अंतर्गत सुवर्णप्राश का उल्लेख आता है । नवजात शिशु को जन्म से एक माह तक प्रतिदिन नियमित रूप से सुवर्णप्राश देने से वह अतिशय बुद्धिमान बनता है और सभी प्रकार के रोगों से उसकी रक्षा होती है । सुवर्णप्राश मेधा, बुद्धि, बल, जठराग्नि तथा आयुष्य बढानेवाला, कल्याणकारक व पुण्यदायी है । ६ मास तक नियमित रूप से इसका सेवन करने से बालक श्रुतिधर होता है अर्थात् सुनी हुई हर बात धारण कर लेता है । यह बालकों की रोगप्रतिकारक शक्ति बढ़ाता है, जिससे बाल्यावस्था में बार-बार उत्पन्न होनेवाले सर्दी, खाँसी, जुकाम, दस्त, उलटी, न्यूमोनिया आदि कफजन्य विकारों से छुटकारा मिलता है।

बालक के जन्म पश्चात यदि माता ६ माह तक सुवर्णप्राश का सेवन करें, दूध के माध्यम से स्वभाविक ही बच्चे में  सुवर्णप्राश की आपूर्ति हो जाती है |

यह एक प्रकार का आयुर्वेदिक रोगप्रतिरोधक टीका भी है, जो बालकों की पोलियो, क्षयरोग (टी.बी.), विसूचिका (कॉलरा) आदि से रक्षा करता है।

       सुवर्ण भस्म के साथ ब्राम्ही, ज्योतिष्मति, वचा, अर्जुन, हरीतकी आदि अनुभूत औषधियाँ मिलाकर बनाया गया यह सुवर्णप्राश बालकों के बौद्धिक, मानसिक व शारीरिक विकास के लिये अत्यंत उपयुक्त है । नवजात शिशु को जन्म से रोज नियमित रुप से सुवर्णप्राश देने से वह स्वस्थ, अतिशय बुद्धिमान एवं श्रुतघर (जो सुने वह याद रह जाता है ।) होता है। यह मेधा, बुद्धि, आयु, बल, कांति, अग्नि को बढानेवाला, वृष्य, पुण्यदायी, कल्याणकारक और ग्रहबाधा दूर करनेवाला है। इस लिये यह ग्रह बाधा निवारक पुष्यनक्षत्र में बनाया जाता है। विद्यार्थी भी धारणा शक्ति, स्मरणशक्ति, प्राणशक्ति तथा शारीरिक शक्ति बढाने के लिये इसका उपयोग कर सकते हैं। यह एक उत्तम गर्भपोषक है । माताएँ इसका उपयोग कर स्वस्थ तेजस्वी, मेधावी संतान को जन्म दे सकती है। वृद्धावस्था में भी दुर्बल शरीर को कार्यक्षम बनाने के लिये यह कल्याणकारक सुवर्णप्राश विशेष लाभदायी है ।

सुवर्णप्राश सेवन विधि :-

  • प्रथम दिन से 15 दिन तक 1/8 गोली 1 बार लें
  • 15 दिन से 3 माह तक 1/4 गोली 1 बार लें
  • 3 माह से 6 माह तक 1/2 गोली 1 बार लें
  • 6 माह से 2 साल तक 1 गोली 1 बार लें
  • 2 साल से 5 साल तक 1 गोली 2 बार लें
  • 5 साल से ऊपर 2 गोलीयाँ 2 बार लें

अनुपान :- गाय का घी अथवा गाय के दूध के साथ लें ।

सुवर्णप्राश संत श्री आशारामजी आश्रम के उपचार केन्द्रों एवं सत्साहित्य स्टॉल पर उपलब्ध है । Online मँगवाने हेतु संपर्क करें – Visit us on ashramestore.com

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गर्भस्थ शिशु को सुसंस्कारी बनाने तथा उसके उचित पालन-पोषण की जानकारी देने हेतु पूज्य संत श्री आशारामजी बापू द्वारा प्रेरित महिला उत्थान मंडल द्वारा लोकहितार्थ दिव्य शिशु संस्कार अभियान प्रारंभ किया गया है ।