“माताएँ ! आप भगवान की भी माँ बन सकती हैं”

पूज्य बापू जी का यह वचन  — “माताएँ ! आप भगवान की भी माँ बन सकती हैं” — केवल भावुक कथन नहीं है, बल्कि यह भागवत-पुराण और गर्भ-संस्कार विज्ञान का सार है । भारतीय ऋषि-परंपरा ने हजारों वर्ष पूर्व यह स्पष्ट कर दिया था कि संतान केवल शरीर से नहीं, माँ की चेतना, संस्कार, भाव और साधना से निर्मित होती है।

भागवत में कश्यप ऋषि की पत्नियों — दिति और अदिति — का प्रसंग इसी सत्य को उजागर करता है ।

दिति का अर्थ है द्वैत — भेदभाव, कामना और असंयम ।

अदिति का अर्थ है अद्वैत — समन्वय, शुद्ध दृष्टि और ईश्वर-आश्रय ।

गर्भ-संस्कार का मूल सिद्धांत

गर्भ-संस्कार का मूल सूत्र यह है कि “जैसी माँ की वृत्ति, वैसी संतान की प्रवृत्ति ।”

जब दिति ने अशुभ समय, अशुभ स्थान और कामना-प्रधान भाव से गर्भधारण किया, तो उसके गर्भ से हिरण्याक्ष और हिरण्यकशिपु जैसे दैत्य प्रवृत्ति वाले पुत्र उत्पन्न हुए ।

यहाँ ध्यान देने योग्य बात यह है कि दोष केवल कर्म का नहीं था, बल्कि भाव और चेतना का था । किन्तु उसी दिति ने जब पश्चाताप किया, क्षमा माँगी और प्रायश्चित्त किया, तब भगवत्कृपा से उसी वंश में प्रह्लाद जैसे महान भक्त का जन्म हुआ । यह स्पष्ट प्रमाण है कि गर्भ में संस्कार बदले जा सकते हैं।

भागवत में चार प्रकार की माताएँ

भागवत-पुराण में चार माताओं के उदाहरण मिलते हैं, जो गर्भ-संस्कार के चार स्तर दर्शाते हैं:

  1. दिति – जिनके गर्भ से दैत्य प्रवृत्ति की संतान उत्पन्न हुई
  2. शतरूपा – जिनके गर्भ से भक्त-स्वभाव की संतान उत्पन्न हुई
  3. देवहूति – जिन्होंने स्वयं भगवान कपिल को जन्म दिया
  4. अदिति – जिनके गर्भ से देवताओं का जन्म हुआ

यह भेद शरीर का नहीं, माताओं की आंतरिक अवस्था (Inner State) का है।

आधुनिक विज्ञान भी अब यह स्वीकार करता है कि गर्भस्थ शिशु पर माँ के

  • विचार
  • भावनाएँ
  • तनाव
  • संगीत
  • मंत्र
  • आहार-विहार का गहरा प्रभाव पड़ता है।

हमारे शास्त्रों में बताया गया है कि पाँच ज्ञानेन्द्रियों से ग्रहण किए गए विषय — शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गंध — माँ के मन पर प्रभाव डालते हैं और वही प्रभाव रज-वीर्य के माध्यम से संतान के स्वभाव में उतर जाता है ।

जब गर्भवती माँ का आश्रय भी भगवान हों और प्रीति भी भगवान से हो, तब गर्भ में आने वाली संतान भी भगवद्भाव लेकर आती है और जीवन में देर-सवेर ईश्वर को प्राप्त करती है।

मातृत्व का सर्वोच्च गौरव

इसी गर्भ-संस्कार परंपरा के कारण भारत भूमि ने कबीर साहब, गुरु नानक देव, रामकृष्ण परमहंस, रमण महर्षि, साईं लीलाशाह जैसे ब्रह्मवेत्ता महापुरुषों को जन्म दिया।

माता केवल जन्मदात्री नहीं, संस्कारदात्री है। संस्कार ही संतान का भविष्य तय करते हैं।

गर्भ-संस्कार केवल गर्भावस्था का विषय नहीं, बल्कि माँ की चेतना का साधन है।

यदि माँ कामना, क्रोध और द्वैत में रहे — तो दैत्य प्रवृत्ति संभव है।

यदि माँ भक्ति, शुद्धता और ईश्वर-आश्रय में रहे — तो वही माँ भगवान की भी माँ बन सकती है।

 

आप कैसी माँ बनना चाहती हैं ? Comment box में लिखें ।

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गर्भस्थ शिशु को सुसंस्कारी बनाने तथा उसके उचित पालन-पोषण की जानकारी देने हेतु पूज्य संत श्री आशारामजी बापू द्वारा प्रेरित महिला उत्थान मंडल द्वारा लोकहितार्थ दिव्य शिशु संस्कार अभियान प्रारंभ किया गया है ।