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नारी-समाज को पुन: अपनी महिमा से अवगत करने, उसके सर्वांगीण विकास का मार्गदर्शन करने तथा मनुष्य जीवन के वास्तविक उद्देश्य भगवतप्राप्ति के प्रति सजग करने के लिए विश्ववंदनीय ब्रह्मनिष्ठ महापुरुष पूज्य संत श्री आशारामजी बापू की पावन प्रेरणा एवं मार्गदर्शन में ‘महिला उत्थान मंडल’ का गठन किया गया जिसके जिसके अन्तर्गत गर्भस्थ शिशु को सुसंस्कारी बनाने तथा उसके उचित पालन-पोषण की जानकारी देने हेतु पूज्य संत श्री आशारामजी बापू द्वारा प्रेरित महिला उत्थान मंडल द्वारा लोकहितार्थ दिव्य शिशु संस्कार अभियान प्रारंभ किया गया है ।

तृप्तिदायक पेय सत्तू

तृप्तिदायक पेय सत्तू

  • प्राचीन काल से जौ का उपयोग होता चला आ रहा है । कहा जाता है कि प्राचीन काल में ऋषि-मुनियों का आहार मुख्यतः जौ थे । वेदों ने भी यज्ञ की आहुति के रूप में जौ को स्वीकार किया है । गुणवत्ता की दृष्टि से गेहूँ की अपेक्षा जौ हलका धान्य है । उत्तर प्रदेश में गर्मी की ऋतु में भूख-प्यास शांत करने के लिए सत्तू का उपयोग अधिक होता है । जौ को भूनकर, पीसकर, उसके आटे में थोड़ा सेंधा नमक और पानी मिलाकर सत्तू बनाया जाता है । कई लोग नमक की जगह गुड़ भी डालते हैं । सत्तू में घी और चीनी मिलाकर भी खाया जाता है ।

  • सत्तू, मधुर, शीतल, बलदायक, कफ-पित्तनाशक, भूख व प्यास मिटाने वाला तथा श्रमनाशक (धूप, श्रम, चलने के कारण आयी हुई थकान को मिटाने वाला) है ।

सक्तवो वातला रूक्षा बहुर्वचोऽनुलोमिनः।
तर्पयन्ति नरं सद्यः पीताः सद्योबलाश्च ते।।

(चरक संहिता, सूत्रस्थानम् 27.263)

  • ‘सभी प्रकार के सत्तू कफकारक, रूखे, मल निकालने वाले, दोषों का अनुलोमन करने वाले, शीघ्र बलदायक और घोल के पीने पर शीघ्र तृप्ति देने वाले हैं ।’
  • जौ का सत्तू ठंडा, अग्निप्रदीपक, हलका, कब्ज दूर करने वाला, कफ एवं पित्त को हरने वाला, रूक्षता और मल को दूर करने वाला है । गर्मी से तपे हुए एवं कसरत से थके हुए लोगों के लिए सत्तू पीना हितकर है । मधुमेह के रोगी को जौ का आटा अधिक अनुकूल रहता है । इसके सेवन से शरीर में शक्कर की मात्रा बढ़ती नहीं है । जिसकी चरबी बढ़ गयी हो वह अगर गेहूँ और चावल छोड़कर जौ की रोटी एवं बथुए की या मेथी की भाजी तथा साथ में छाछ का सेवन करे तो धीरे-धीरे चरबी की मात्रा कम हो जाती है । जौ मूत्रल (मूत्र लाने वाला पदार्थ) हैं अतः इन्हें खाने से मूत्र खुलकर आता है ।
  • सत्तू को ठण्डे पानी में (मटके आदि का हो, फ्रिज का नहीं) में मध्यम पतला घोल बना के मिश्री मिला के लेना चाहिए । शुद्ध घी मिला के पीना बहुत लाभदायक होता है । 3 भाग चने (भुने, छिलके निकले हुए) व 1 भाग भुने जौ को पीस व छान के बनाया गया सत्तू उत्तम माना जाता है । केवल चने या जौ का भी सत्तू बना सकते हैं ।

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गुलाब का शरबत

गुलाब का शरबत

निर्माण विधि –  गुलाब जल अथवा नलिकायंत्र (वाष्पस्वेदन यंत्र) द्वारा गुलाब की कलियों के निकाले गये अर्क में मिश्री डालकर उसका पाक तैयार करें । जब जरूरत पड़े तब उसमें ठंडा जल मिलाकर शरबत बना लें ।

उपयोग – यह शरबत सुवासित होने के साथ शरीर की गर्मी को नष्ट करता है । अतः ग्रीष्म ऋतु में सेवन करने योग्य है ।

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अनार का शरबत

अनार का शरबत

  • मीठा अनार तीनों दोषों का शमन करने वाला, तृप्तिकारक, वीर्यवर्धक, हलका, कसैले रसवाला, बुद्धि तथा बलदायक एवं प्यास, जलन, ज्वर, हृदयरोग, कण्ठरोग, मुख की दुर्गन्ध तथा कमजोरी को दूर करने वाला है ।
  • खटमिट्ठा अनार अग्निवर्धक, रुचिकारक, थोड़ा-सा पित्तकारक व हलका होता है । पेट के कीड़ों का नाश करने व हृदय को बल देने के लिए अनार बहुत उपयोगी है । इसका रस पित्तशामक है। इससे उलटी बंद होती है ।
  • अनार पित्तप्रकोप, अरुचि, अतिसार, पेचिश, खाँसी, नेत्रदाह, छाती का दाह व मन की व्याकुलता दूर करता है ।
  • अनार खाने से शरीर में एक विशेष प्रकार की चेतना सी आती है । इसका रस स्वरयंत्र, फेफड़ों, हृदय, यकृत, आमाशय तथा आँतों के रोगों से लाभप्रद है तथा शरीर में शक्ति, स्फूर्ति तथा स्निग्धता लाता है ।

निर्माण विधि – अच्छी तरह से पके हुए 20 अनार के दाने निकालकर उनका रस निकाल लें । उस रस में अदरक डालकर रस गाढ़ा हो जाय तब तक उबालें । उसके बाद उसमें केसर एवं इलायची का चूर्ण मिलाकर शीशी में भर लें ।
उपयोग – यह शरबत रूचिकर एवं पित्तशामक होने की वजह से दवा के रूप में भी लिया जा सकता है एवं गर्मी में शरबत के रूप में पीने से गर्मी से राहत मिलती है ।

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पका आम

पका आम

  • पका आम खाने से सातों धातुओं की वृद्धि होती है । पका आम दुबले पतले बच्चों, वृद्धों व कृश लोगों को पुष्ट बनाने हेतु सर्वोत्तम औषध और खाद्य फल है ।
  • पका आम चूसकर खाना आँखों के लिए हितकर है । यह उत्तम प्रकार का हृदयपोषक है तथा शरीर में छुपे हुए विष को बाहर निकालता है । यह वीर्य की शुद्धि एवं वृद्धि करता है ।
  • शुक्रप्रमेह आदि विकारों और वातादि दोषों के कारण जिनको संतानोत्पत्ति न होती हो उनके लिए पका आम लाभकारक है । इसके सेवन से शुक्राल्पताजन्य नपुंसकता, दिमागी कमजोरी आदि रोग दूर होते हैं ।
  • जिस आम का छिलका पतला एवं गुठली छोटी हो, जो रेशारहित हो तथा जिसमें गर्भदल अधिक हो, ऐसा आम मांस धातु के लिए उत्तम पोषक है ।

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आम का पना

कच्चे आम का शरबत (पना)

निर्माण विधि –  कच्चे आम को छीलकर पानी में उबालें । उसके बाद ठण्डे पानी में मसल-मसलकर रस बनायें । इस रस में स्वाद के अनुसार नमक, जीरा, गुड़ आदि डालकर पियें ।

उपयोग – इस शरबत को पीने से गर्मी से राहत मिलती है । यह अपने देश के शीतल पेयों की प्राचीन परंपरा का एक नुस्खा है जो स्वास्थ्य के लिए अत्यंत लाभदायक है ।

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तरबूज

तरबूज

ग्रीष्म ऋतु का फल –

  • तरबूज प्रायः पूरे भारत में पाया जाता है । पका हुआ लाल गूदेवाला तरबूज स्वाद में मधुर, गुण में शीतल, पित्त एवं गर्मी का शमन करने वाला, पौष्टिकता एवं तृप्ति देने वाला, पेट साफ करने वाला, मूत्रल, वात एवं कफकारक है ।
  • कच्चा तरबूज गुण में ठंडा, दस्त को रोकने वाला, वात व कफकारक, पचने में भारी एवं पित्तनाशक है ।
  • तरबूज के बीज शीतवीर्य, शरीर में स्निग्धता बढ़ानेवाले, पौष्टिक, मूत्रल, गर्मी का शमन करने वाले, कृमिनाशक, दिमागी शक्ति बढ़ाने वाले, दुर्बलता मिटाने वाले, गुर्दों की कमजोरी दूर करने वाले, गर्मी की खाँसी एवं ज्वर को मिटाने वाले क्षय एवं मूत्ररोगों को दूर करने वाले हैं । बीज के सेवन की मात्रा हररोज 10 से 20 ग्राम है। ज्यादा बीज खाने से तिल्ली की हानि होती है ।


सावधानीः

  • गर्म तासीरवालों के लिए तरबूज एक उत्तम फल है लेकिन वात व कफ प्रकृतिवालों के लिए हानिकारक है । अतः सर्दी-खाँसी, श्वास, मधुप्रमेह, कोढ़, रक्तविकार के रोगियों को इसका सेवन नहीं करना चाहिए ।
  • ग्रीष्म ऋतु में दोपहर के भोजन के 2-3 घंटे बाद तरबूज खाना लाभदायक है । यदि तरबूज खाने के बाद कोई तकलीफ हो तो शहद अथवा गुलकंद का सेवन करें ।


औषधि-प्रयोगः

मंदाग्निः  तरबूज के लाल गूदे पर काली मिर्च, जीरा एवं नमक का चूर्ण डालकर खाने से भूख खुलती है एवं पाचनशक्ति बढ़ती है ।

शरीरपुष्टिः तरबूज के बीज के गर्भ का चूर्ण बना लें । गर्म दूध में मिश्री तथा 1 चम्मच यह चूर्ण डालकर उबाल लें। इसके प्रतिदिन सेवन से देह पुष्ट होती है ।
“तरबूज के प्रतिदिन सेवन से देह तो पुष्ट होती है पर यह भी स्मरण रखें कि देह नश्वर है….. आत्मा अमर है । देह को पुष्ट रखेंगे, पर आत्मप्रीति बढ़ायेंगे ।”

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गुणकारी फल – खरबूजा

गर्मियों का गुणकारी फलः खरबूजा

  • खरबूजा गर्मियों का एक गुणकारी फल है । यह शरीर में पानी की कमी को दूर करता है और उसे तरोताजा बनाये रखता है । खरबूजा सेहत से जुड़ी कई समस्याओं को दूर करने में मददगार है । यह विटामिन्स का अच्छा स्रोत है ।
  • आयुर्वेद के अनुसार खरबूजा स्निग्ध, शीतल, बल-वीर्यवर्धक, पेट एवं आँतों की शुद्धि करनेवाला तथा वायु व पित्त शामक होता है । इसके बीज शीतल, मूत्रजनक व बलवर्धक होते हैं ।
  • खरबूजा हृदयरोग, उच्च रक्तचाप (हाई बी.पी.) और रक्त-संचारसंबंधी रोगों में लाभकारी है ।
  • शारीरिक श्रम के बाद इसे खाने से थकान दूर होती है और तृप्ति मिलती है ।
  • खरबूजे के सेवन से पेशाब खुलकर आता है व पेशाब की मात्रा भी बढ़ती है । अतः यह पथरी व गुर्दे संबंधी रोगों को ठीक करने में मदद करता है ।
  • आँतों में चिपके मल को बाहर निकालता है ।
  • आँखों व त्वचा को स्वस्थ रखता है । यह नेत्रज्योति व रोगप्रतिरोधकता को बढ़ाता है ।
  • खरबूजे के छिलकारहित बीजों को बारीक पीस के देशी घी में भून लें । इसमें मिश्री मिला के खाने से चक्कर आना, पागलपन, सुस्ती, आलस्य आदि विकारों में लाभ होता है ।

सावधानियाँ :

  • खरबूजे को ठंडा करके संतुलित मात्रा में खायें । ज्यादा मात्रा में सेवन हानिकारक है ।
  • खरबूजे को किसी अन्य आहार के साथ न खायें । खट्टे, खारे रसवाले तथा रासायनिक ढंग से पके खरबूजे का सेवन न करें ।
  • सुबह खाली पेट खरबूजा न खायें । इसे खाने के बाद तुरंत पानी न पियें ।

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बेलफल

अमृतफल बेल

बेल या बिल्व का अर्थ है : रोगान् बिलाति भिनत्ति इति बिल्व: अर्थात् जो रोगों का नाश करे वह बिल्व ।

बेल के विधिवत् सेवन से शरीर स्वस्थ और सुडौल बनता है । बेल की जड़, शाखाएँ, पत्ते, छाल और फल सब-के-सब औषधियाँ हैं ।

बेल में ह्रदय का बल और ताजगी देने के साथ सात्विक शांति प्रदान करने का भी श्रेष्ठ गुण है । यह स्निग्ध, मुलायम और उष्ण होता है । इसके गूदे, पत्तों तथा बीजों में उड़नशील तेल पाया जाता है, जो औषधीय गुणों से भरपूर होता है ।

कच्चे और पके बेलफल के गुण तथा उससे होनेवाला लाभ अलग अलग प्रकार के होते हैं ।

कच्चा बेलफल भूख व पाचनशक्ति बढ़ानेवाला तथा कृमियों का नाश करनेवाला है । ह मल के साथ बहनेवाले जलयुक्त भाग का शोषण करनेवाला होने के कारण अतिसार रोग में अत्यंत हितकारी है । इसके नियमित सेवन से कॉलरा (हैजा) से रक्षण होता है ।

पका हुआ बेलफल मधुर, कसैला पचने में भारी तथा मृदु विरेचक है । इसके सेवन से दस्त साफ होते हैं ।

औषधि-प्रयोग :

संग्रहणी : इस व्याधि में पाचनशक्ति अत्यंत कमजोर हो जाती है । बार-बार दुर्गंधवाले चिकने दस्त होते हैं । इसके लिए दो बेलफल का गुदा ४०० मि.ली. पानी में उबालकर छान लें । फिर ठंडा कर उसमें २० ग्राम शहद मिलाकर सेवन करें ।

पुरानी संग्रहणी : प्रतिदिन बेल का १०० ग्राम गुदा व २५० ग्राम दूध के तीन समभाग कर लें और सुबह, दोपहर और शाम को एक-एक भाग को मिलाकर पियें ।

पेचिश : बेलफल आतों को शक्ति देता है । एक बेल के गूदे से बीज निकालकर सुबह-शाम सेवन करने से पेट में मरोड़ नहीं आती है ।

जलन : २०० मि.ली. पानी में २५ ग्राम बेल का गुदा व २५ ग्राम मिश्री मिलाने पर जा शरबत बनता है उसे पीने से छाती, पेट, आँख या पाँव की जलन में राहत मिलती है ।

मुँह के छाले : एक बेल का गुदा १०० ग्राम पानी में उबालें । ठंडा हो जाने पर उस पानी से कुल्ले करें । छाले छू हो जायेंगे ।

प्रमेह : बेल एवं बकुल की छाल का २ ग्राम चूर्ण दूध के साथ लें ।

दिमागी थकावट : एक पक्के बेल का गूदा रात्रि के समय पानी में रखें । सुबह छानकर उसमें मिश्री मिला लें और प्रतिदिन पियें । इससे दीमाग तरोताजा हो जाता है ।

कान का दर्द, बहरापन : बेलफल को गोमूत्र में पीसकर उसे १०० मि.ली दूध, ३००मि.ली. पानी तथा १०० मि.ली. तिल के तेल में मिलाकर धीमी आँच पर उबालें । यह बिल्वसिद्ध तेल प्रतिदिन ४-४ बूँदें कान में डालने से कान का दर्द तथा बहरेपन में लाभ होता है ।

उलटी : बेलफल के गूदे का ३० से ५० मि.ली काढ़ा शहद मिलाकर पीने से त्रिदोषजन्य उलटी में आराम मिलता है ।

गर्भवती स्रियों को उलटी या अतिसार होने पर कच्चे बेल के २० से ५० मि.ली. काढ़ें में सत्तू मिलाकर देने से राहत मिलती है ।

बार-बार उल्टियाँ होने पर अथवा किसी भी चिकित्सा से उलटी में राहत न मिलने पर बेलफल के गूदे का पाँच ग्राम चूर्ण चावल के धोवन के साथ लेने से आराम है, साथ ही यह संग्रहणी, प्रवाहिका व अतिसार में भी लाभकारी होता है ।

पाचन-रोग : पके हुए बेलफल का गूदा निकलकर उसे छाया में सुखा लें फिर पीसकर चूर्ण बनायें । इस चूर्ण को छ: महीने तक ही प्रयोग में लाया जा सकता है । इसमें पाचकतत्व पूर्णरूप से समाविष्ट होते हैं । आवश्यकता पड़ने पर २ से ५ ग्राम चूर्ण पानी में मिलाकर सेवन कर सकते है

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गन्ना – ईख

गन्ना - ईख

आजकल अधिकांश लोग मशीन या ज्यूसर आदि से निकाला हुआ रस पीते हैं । सुश्रुत संहिता के अनुसार यंत्र (मशीन, ज्यूसर आदि) से निकाला हुआ रस भारी, दाहकारी, कब्जकारक होने के साथ ही (यदि शुद्धतापूर्वक नहीं निकाला गया है तो) संक्रामक कीटाणुओं से युक्त भी हो सकता है ।
अविदाही कफकरो वातपित्त निवारणः।

वक्त्र प्रहलादनो वृष्यो दंतनिष्पीडितो रसः।।

सुश्रुत संहिता के अनुसार गन्ने को दाँतों से चबाकर उसका रस चूसने पर वह दाहकारी नहीं होता और इससे दाँत मजबूत होते हैं । अतः गन्ना चूस कर खाना चाहिए ।
भावप्रकाश निघण्टु के अनुसार गन्ना रक्तपित्त नामक व्याधि को नष्ट करने वाला, बलवर्धक, वीर्यवर्धक, कफकारक, पाक तथा रस में मधुर, स्निग्ध, भारी, मूत्रवर्धक व शीतल होता है। ये सब पके हुए गन्ने के गुण हैं।

औषधि-प्रयोग –

पथरीः गन्ना नित्य चूसते रहने से पथरी टुकड़े टुकड़े होकर बाहर निकल जाती है।

पित्त की उलटी होने परः 1 गिलास गन्ने के रस में 2 चम्मच शहद मिलाकर पिलाने से लाभ होता है।

रक्तातिसारः एक कप गन्ने के रस में आधा कप अनार का रस मिलाकर सुबह-शाम पिलाने से रक्तातिसार मिटता है।

विशेष –

यकृत की कमजोरी वाले, हिचकी, रक्तविकार, नेत्ररोग, पीलिया, पित्तप्रकोप व जलीय अंश की कमी के रोगी को गन्ना चूसकर ही सेवन करना चाहिए।
इसके नियमित सेवन से शरीर का दुबलापन दूर होता है और पेट की गर्मी व हृदय की जलन दूर होती है।
शरीर में थकावट दूर होकर तरावट आती है। पेशाब की रुकावट व जलन भी दूर होती है।

सावधानी –
मधुमेह, पाचनशक्ति की मंदता, कफ व कृमि के रोगवालों को गन्ने के रस का सेवन नहीं करना चाहिए।
कमजोर मसूढ़ेवाले, पायरिया व दाँतों के रोगियों को गन्ना चूसकर सेवन नहीं करना चाहिए।
एक मुख्य बात यह है कि बाजारू मशीनों द्वारा निकाले गये रस से संक्रामक रोग होने की संभावना रहती है। अतः गन्ने का रस निकलवाते समय शुद्धता का विशेष ध्यान रखें।

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रूचिकर व पोषक नारियल पानी

रूचिकर व पोषक नारियल पानी

  • सुबह चाय के बदले नारियल पानी में नींबू का रस निचोड़कर पीने से शरीर की सारी गर्मी मूत्र एवं मल के साथ निकल जाती है और रक्त शुद्ध होता है । बच्चों में कृमि तथा उलटी में भी यह नींबू युक्त पानी लाभकारी है । हृदय, यकृत एवं गुर्दे के रोगों में यह लाभप्रद है । यह दवाइयों के विषैले असर को नष्ट कर देता है ।

  • नारियल का पानी पीने से गर्भवती स्त्री गौरवर्णीय बालक को जन्म देती है । फिर चाहे माता-पिता श्याम ही क्यों न हों ।

  • दक्षिण भारत में स्तनपान कराने वाली माँ का दूध कम हो जाने पर गाये के दूध में नारियल का पानी मिलाकर पिलाते हैं । इससे शिशु नारियल के पानी के कारण गाय के दूध को पचा के लेते हैं ।
    हैजे में नारियल का पानी आशीर्वादस्वरूप है । हैजे के विषाक्त कीटाणु आँतों में जाते हैं । साथ ही शरीर में कम हुए सोडियम एवं पोटैशियम की पूर्ति कर जलीय अंश की वृद्धि करता है ।

  • ‘स्कूल ऑफ ट्रॉपिकल मैडिसिन’ के विशेषज्ञों का मत है कि हैजे में पोटैशियम सॉल्ट के इंजेक्शन देने के बजाय नारियल के पानी में निहित प्राकृतिक पोटैशियम देना लाभदायी है ।

  • 100 ग्राम नारियल पानी में निम्नानुसार तत्त्व पाये जाते हैं- कार्बोहाइड्रेट-3.71 ग्राम, प्रोटीन- 0,72 ग्राम, लौह- 0,29 ग्राम, फॉस्फोरस- 20 मि.ग्राम, सोडियम-105 मि.ग्रा, पोटैशियम-250 मि.ग्राम, विटामिन सी- 2.4 ग्राम, ऊर्जा-19 कैलोरी । इनके अलावा मैग्नेशियम तथा क्लोरीन आदि खनिज तत्त्व भी होते हैं ।

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धनिया

धनिया

  • धनिया सर्वत्र प्रसिद्ध है। भोजन बनाने में इसका नित्य प्रयोग होता है।
  • सब्जी, दाल जैसे खाद्य पदार्थों में काटकर डाला हुआ हरा धनिया उसे सुगंधित एवं गुणवान बनाता है।
  • हरा धनिया गुण में ठंडा, रूचिकारक व पाचक है। इससे भोज्य पदार्थ अधिक स्वादिष्ट व रोचक बनते हैं।
  • हरा धनिया केवल सब्जी में ही उपयोग में आने वाली वस्तु नहीं है वरन् उत्तम प्रकार की एक औषधि भी है। इसी कारण अनेक वैद्य इसका उपयोग करने की सलाह देते हैं।

गुणधर्मः हरा धनिया स्वाद में कटु, कषाय, स्निग्ध, पचने में हलका, मूत्रल, दस्त बंद करने वाला, जठराग्निवर्द्धक, पित्तप्रकोप का नाश करने वाला एवं गर्मी से उत्पन्न तमाम रोगों में भी अत्यंत लाभप्रद है।


औषधि-प्रयोगः


बुखारः अधिक गर्मी से उत्पन्न बुखार या टायफाइड के कारण यदि दस्त में खून आता हो तो हरे धनिये के 25 मि.ली. रस में मिश्री डालकर रोगी को पिलाने से लाभ होता है ।
ज्वर से शरीर में होती जलन पर इसका रस लगाने से लाभ होता है ।


आंतरदाहः चावल में पानी के बदले हरे धनिये का रस डालकर एक बर्तन (प्रेशर कूकर) में पकायें। फिर उसमें घी तथा मिश्री डालकर खाने से किसी भी रोग के कारण शरीर में होने वाली जलन शांत होती है ।


अरुचिः सूखा, धनिया, इलायची व काली मिर्च का चूर्ण घी और मिश्री के साथ लें । हरा धनिया, पुदीना, काली मिर्च, सेंधा नमक, अदरक व मिश्री पीसकर उसमें जरा सा गुड़ व नींबू का रस मिलाकर चटनी तैयार करें । भोजन के समय उसे खाने से अरुचि व मंदाग्नि मिटती है ।


तृषा रोगः हरे धनिये के 50 मि.ली. रस में मिश्री या हरे अंगूर का रस मिलाकर पिलायें ।
सगर्भा की उलटीःहरे धनिये के रस में हलका-सा नींबू निचोड़ लें । यह रस एक-एक चम्मच थोड़े-थोड़े समय पर पिलाने से लाभ होता है ।


रक्तपित्तः सूखा धनिया, अंगूर व बेदाना का काढ़ा बनाकर पिलायें । हरे धनिये के रस में मिश्री या अंगूर का रस मिलाकर पिलायें। साथ में नमकीन, तीखे व खट्टे पदार्थ खाना बंद करें और सादा, सात्त्विक आहार लें।

  • बच्चों के पेटदर्द व अजीर्णः सूखा धनिया और सोंठ का काढ़ा बनाकर पिलायें ।
  • बच्चों की आँखें आने परः सूखे पिसे हुए धनिये की पोटली बाँधकर उसे पानी में भिगोकर बार-बार आँखों पर घुमायें ।
  • हरा धनिया धोकर, पीसकर उसकी एक-दो बूँदें आँखों में डालें। आँखें आना, आँखों की लालिमा, आँखों की कील, गुहेरी एवं चश्मे के नंबर दूर करने में यह लाभदायक है ।

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धनिये का पना

धनिये का पना

5 से 10 ग्राम बारीक पिये सूखे धनिये में आवश्यकतानुसार मिश्री मिलाकर मिट्टी के पात्र में 2-4 घंटे रखें, थोड़ी पिसी हुई इलायची भी डाल दें । इसके सेवन से शरीर की गर्मी और जलन कम होती है। पित्त का शमन होता है ।

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पुदीना

पुदीना

  • पुदीने का उपयोग अधिकांशतः चटनी या मसाले के रूप में किया जाता है। पुदीना एक सुगंधित एवं उपयोगी औषधि है। यह अपच को मिटाता है।
  • आयुर्वेद के मतानुसार पुदीना, स्वादिष्ट, रुचिकर, पचने में हलका, तीक्ष्ण, तीखा, कड़वा, पाचनकर्ता, उलटी मिटाने वाला, हृदय को उत्तेजित करने वाला, शक्ति बढ़ानेवाला, वायुनाशक, विकृत कफ को बाहर लाने वाला, गर्भाशय-संकोचक, चित्त को प्रसन्न करने वाला, जख्मों को भरने वाला, कृमि, ज्वर, विष, अरुचि, मंदाग्नि, अफरा, दस्त, खाँसी, श्वास, निम्न रक्तचाप, मूत्राल्पता, त्वचा के दोष, हैजा, अजीर्ण, सर्दी-जुकाम आदि को मिटाने वाला है।
  • पुदीने का रस पीने से खाँसी, उलटी, अतिसार, हैजे में लाभ होता है, वायु व कृमि का नाश होता है।
  • पुदीने में रोगप्रतिकारक शक्ति उत्पन्न करने की अदभुत शक्ति है एवं पाचक रसों को उत्पन्न करने की भी क्षमता है। अजवायन के सभी गुण पुदीने में पाये जाते हैं।
  • पुदीने के बीज से निकलने वाला तेल स्थानिक एनेस्थटिक, पीड़ानाशक एवं जंतुनाशक होता है। यह दंतपीड़ा एवं दंतकृमिनाशक होता है। इसके तेल की सुगंध से मच्छर भाग जाते हैं।

औषधि-प्रयोगः

मंदाग्निः पुदीने में विटामिन ए अधिक मात्रा में पाया जाता है। इसमें जठराग्नि को प्रदीप्त करने वाले तत्त्व भी अधिक मात्रा में हैं। इसके सेवन से भूख खुलकर लगती है। पुदीना, तुलसी, काली मिर्च, अदरक आदि का काढ़ा पीने से वायु दूर होता है व भूख खुलकर लगती है।


त्वचाविकारः दाद-खाज पर पुदीने का रस लगाने से लाभ होता है। हरे पुदीने की चटनी बनाकर सोते समय चेहरे पर उसका लेप करने से चेहरे के मुँहासे, फुंसियाँ समाप्त हो जाती हैं।


हिचकीः हिचकी बंद न हो रही हो तो पुदीने के पत्ते या नींबू चूसें।


पैर-दर्दः सूखा पुदीना व मिश्री समान मात्रा में मिलायें एवं दो चम्मच फंकी लेकर पानी पियें। इससे पैर-दर्द ठीक होता है।


मलेरियाः पुदीने एवं तुलसी के पत्तों का काढ़ा बनाकर सुबह-शाम लेने से अथवा पुदीना एवं अदरक का 1-1 चम्मच रस सुबह-शाम लेने से लाभ होता है।


वायु एवं कृमिः पुदीने के 2 चम्मच रस में एक चुटकी काला नमक डालकर पीने से गैस, वायु एवं पेट के कृमि नष्ट होते हैं। प्रातः काल एक गिलास पानी में 20-25 ग्राम पुदीने का रस व 20-25 ग्राम शहद मिलाकर पीने से गैस की बीमारी में विशेष लाभ होता है।


पुरानी सर्दी-जुकाम व न्यूमोनियाः पुदीने के रस की 2-3 बूँदें नाक में डालने एवं पुदीने तथा अदरक के 1-1 चम्मच रस में शहद मिलाकर दिन में 2 बार पीने से लाभ होता है।


अनार्तव-अल्पार्तवः मासिक न आने पर या कम आने पर अथवा वायु एवं कफदोष के कारण बंद हो जाने पर पुदीने के काढ़े में गुड़ एवं चुटकी भर हींग डालकर पीने से लाभ होता है। इससे कमर की पीड़ा में भी आराम होता है।


आँत का दर्दः अपच, अजीर्ण, अरुचि, मंदाग्नि, वायु आदि रोगों में पुदीने के रस में शहद डालकर लें अथवा पुदीने का अर्क लें।


दादः पुदीने के रस में नींबू मिलाकर लगाने से दाद मिट जाती है।


उल्टी-दस्त, हैजाः पुदीने के रस में नींबू का रस, प्याज अथवा अदरक का रस एवं शहद मिलाकर पिलाने अथवा अर्क देने से ठीक होता है।


बिच्छू का दंशः बिच्छू के काटने पर इसका रस पीने से व पत्तों का लेप करने से बिच्छू के काटने से होने वाला कष्ट दूर होता है। पुदीने का रस दंशवाले स्थान पर लगायें एवं उसके रस में मिश्री मिलाकर पिलायें। यह प्रयोग तमाम जहरीले जंतुओं के दंश के उपचार में काम आ सकता है।


हिस्टीरियाः रोज पुदीने का रस निकालकर उसे थोड़ा गर्म करके सुबह शाम नियमित रूप से देने पर लाभ होता है।


मुख की दुर्गन्धः पुदीने की रस में पानी मिलाकर अथवा पुदीने के काढ़े का घूँट मुँह में भरकर रखें, फिर उगल दें। इससे मुख की दुर्गन्ध का नाश होता है।


विशेष –
पुदीने का ताजा रस लेने की मात्रा 5 से 10 मि.ग्रा. पत्तों का चूर्ण लेने की मात्रा 3 से 6 ग्राम, काढ़ा लेने की मात्रा 20 से 50 ग्राम, अर्क लेने की मात्रा 10 से 20 मि.ग्रा. तक है।

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फालसा

फालसा

  • फालसा स्निग्ध, मधुर, अम्ल और तिक्त है। कच्चे फल का पाक खट्टा एवं पके फल का विपाक मधुर, शीतवीर्य, वात-पित्तशामक एवं रुचिकर्ता होता है।

  • फालसे पके फल स्वाद में मधुर, स्वादिष्ट, पाचन में हलके, तृषाशामक, उलटी मिटाने वाले, दस्त में सहायक, हृदय के लिए हितकारी है।

  • फालसा रक्तपित्तनाशक, वातशामक, कफहर्ता, पेट एवं यकृत के लिए शक्तिदायक, वीर्यवर्धक, दाहनाशक, सूजन मिटाने वाला, पौष्टिक, कामोद्दीपक, पित्त का ज्वर मिटाने वाला, हिचकी एवं श्वास की तकलीफ, वीर्य की कमजोरी एवं क्षय जैसे रोगों में लाभकर्ता है।

  • वह रक्तविकार को दूर करके रक्त की वृद्धि भी करता है।

  • आधुनिक विज्ञान की दृष्टा से फालसे में विटामिन सी एवं केरोटीन तत्त्व भरपूर मात्रा में है।

  • गर्मी के दिनों में फालसा एक उत्तम फल है। फालसा शरीर को निरोगी एवं हृष्ट-पुष्ट बनाता है।

  • फालसे के फल के अन्दर बीज होता है। फालसे को बीज के साथ भी खा सकते हैं।

  • शरीर से किसी भी मार्ग के द्वारा होने वाले रक्तस्राव की तकलीफ में पके फालसे के रस का शरबत बना कर पीना लाभकारी है।

  • फालसे का शरबत हृदय पोषक (हार्ट टॉनिक) है। यह शरबत स्वादिष्ट एवं रुचिकर होता है।

  • गर्मियों के दिनों में शरीर में होने वाले दाह, जलन तथा पेट एवं दिमाग जैसे महत्त्वपूर्ण अंगों की कमजोरी आदि फालसे के सेवनसे दूर होती है। फालसे का मुरब्बा भी बनाया जाता है।

औषधि-प्रयोगः

पेट का शूलः सिकी हुई 3 ग्राम अजवायन में फालसे का 25 से 30 ग्राम रस डालकर थोड़ा सा गर्म करके पीने से पेट का शूल मिटता है।

पित्तविकारः गर्मी के दोष, नेत्रदाह, मूत्रदाह, छाती या पेट में दाह, खट्टी डकार आदि की तकलीफ में फालसे के रस का शरबत बनाकर पीना तथा उष्ण-तीक्ष्ण खुराक बंद कर केवल सात्त्विक खुराक लेने से पित्तविकार मिटते हैं और अधिक तृषा से भी राहत मिलती है।

हृदय की कमजोरीः फालसे का रस, नींबू का रस, 1 चुटकी सेंधा नमक, 1-2 काली मिर्च लेकर उसमें स्वादानुसार मिश्री मिलाकर पीने से हृदय की कमजोरी में लाभ होता है।

पेट की कमजोरीः पके फालसे के रस में गुलाब जल एवं मिश्री मिलाकर रोज पीने से पेट की कमजोरी दूर होती है एवं उलटी उदरशूल, उबकाई आना आदि तकलीफें दूर होती हैं एवं रक्तदोष भी मिटता है।

दिमाग की कमजोरीः कुछ दिनों तक नाश्ते के स्थान पर फालसे का रस उपयुक्त मात्रा में पीने से दिमाग की कमजोरी एवं सुस्ती दूर होती है, फुर्ती और शक्ति पैदा होती है।

मूढ़ या मृत गर्भः कई बार गर्भवती महिलाओं के गर्भाशय में स्थित गर्भ मूढ़ या मृत हो जाता है। ऐसी अवस्था में पिण्ड को जल्दी बाहर निकालना एवं माता के प्राणों की रक्षा करना आवश्यक होता है। ऐसी परिस्थिति में अन्य कोई उपाय न हो तो फालसा के मूल को पानी में घिसकर उसका लेप गर्भवती महिला की नाभि के नीचे पेड़ू, योनि एवं कमर पर करने से पिण्ड जल्दी बाहर आ जायेगा। पिण्ड बाहर आते ही तुरन्त लेप निकाल दें, नहीं तो गर्भाशय बाहर आने की सम्भावना रहती है।
श्वास, हिचकी, कफः कफदोष से होने वाले श्वास, सर्दी तथा हिचकी में फालसे का रस थोड़ा गर्म करके उसमें थोड़ा अदरक का रस एवं सेंधा नमक डालकर पीने से कफ बाहर निकल जाता है तथा सर्दी, श्वास की तकलीफ एवं हिचकी मिट जाती है।

मूत्रदाहः 25 ग्राम फालसे, 5 ग्राम आँवले का चूर्ण, 10 ग्राम काली द्राक्ष, 10 ग्राम खजूर, 50 ग्राम चंदन चूर्ण, 10 ग्राम सौंफ का चूर्ण लें।
सर्वप्रथम आँवला चूर्ण, चंदन चूर्ण एवं सौंफ का चूर्ण लेकर मिला लें। फिर खजूर, द्राक्ष एवं फालसे को आधा कूट लें। रात्रि में इस सबको पानी में भिगोकर रख दें।
सुबह 20 ग्राम मिश्री डालकर अच्छी तरह से मिश्रित कर के छान लें। उसके 2 भाग करके सुबह-शाम 2 बार पियें। खाने में दूध, घी, रोटी, मक्खन, फल एवं मिश्री की चीजें लें।
सभी गरम खुराक खाना बंद कर दें। इस प्रयोग से मूत्र, गुदा, आँख या योनि की अथवा अन्य किसी भी प्रकार की जलन मिटती है।
महिलाओं का श्वेत प्रदर, अति मासिकस्राव होना तथा पुरुषों का शुक्रमेह आदि मिटता है। दिमाग की अनावश्यक गर्मी दूर होती है

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श्रीमद भगवत गीता का जीवन में महत्व

श्रीमदभगवतगीता का गर्भवती के लिए महत्व...

श्लोक उच्चारण का महत्व

शास्त्रों में ऐसा वर्णित है और वैज्ञानिकों ने भी इसे प्रमाणित किया है की यदि नियमित संस्कृत के श्लोकों का उच्चारण किया जाए तो स्मरण शक्ति बढ़ती है और शब्दों का उच्चारण स्पष्ट होता है अतः गर्भवती को चाहिए की वह नियमित रूप से श्रीमद भगवद  गीता का पाठ करें जिससे गर्भस्थ शिशु की स्मरण शक्ति में वृद्दि हो और जन्म के बाद जब बच्चा बोलना शुरू करे तो उसके शब्दों के उच्चारण स्पष्ट होंगे। और श्रीमद भगवद गीत अपने आप में एक ऐसा ग्रंथ है जो ज्ञान का सागर है अगर ऐसे गरबटह का पठन गर्भवती करेगी तो निश्चित ही उसकी संतान दैवीय गुणों से सम्पन्न होगी। 

 

गीता का सार आत्म-ज्ञान

श्री कृष्ण कहते हैं कि आत्म मंथन करके स्वयं को पहचानो क्योंकि जब स्वयं को पहचानोगे तभी क्षमता का आंकलन कर पाओगे। ज्ञान रूपी तलवार से अज्ञान को काट कर अलग कर देना चाहिए। जब व्यक्ति अपनी क्षमता का आंकलन कर लेता है तभी उसका उद्धार हो पाता है।भगवान श्री कृष्ण कहते हैं कि मृत्यु एक अटल सत्य है, किंतु केवल यह शरीर नश्वर है। आत्मा अजर अमर है, आत्मा को कोई काट नहीं सकता अग्नि जला नहीं सकती और पानी गीला नहीं कर सकता। जिस प्रकार से एक वस्त्र बदलकर दूसरे वस्त्र धारण किए जाते हैं उसी प्रकार आत्मा एक शरीर का त्याग करके दूसरे जीव में प्रवेश करती है। श्रीमद्भागवत गीता में भगवान कृष्ण के द्वारा रण भूमि में अर्जुन को उपदेश दिए गए हैं। गीता की बातें मनुष्य को सही तरह से जीवन जीने का रास्ता दिखाती हैं। गीता के उपदेश हमें धर्म के मार्ग पर चलते हुए अच्छे कर्म करने की शिक्षा देते हैं। महाभारत में युद्ध भूमि में खड़े अर्जुन और कृष्ण के बीच के संवाद से हर मनुष्य को प्रेरणा लेनी चाहिए। अपने गर्भस्थ शिशु में गीत के ज्ञान का सिंचन अवश्य करें ताकि हमारी आने वाली पीढ़ी धर्म के मार्ग पर चल सके और आत्म-ज्ञान प्राप्त कर सके। 

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पूज्य बापूजी का 58 वां आत्मसाक्षात्कार दिवस….

आत्म साक्षात्कार का अर्थ क्या है ?

साक्षात्कार का मतलब है पूर्ण विश्रांति, पूर्व है ज्ञान, पूर्ण शांति, पूर्ण उपलब्धि ! पूर्ण तो परमात्मा है। गुरुकृपा से परमात्मा के सत्यत्व को परमात्मा के चेतनत्व को, परमात्मा के आनंदत्व को, परमात्मा के अमिट तत्त्व को जानकर अपनी देह के गर्व, अभिमान और अपनी देह की कृति तुच्छ मान के उसमें कर्तृत्वभाव को अलविदा कर देना, इसका नाम है ‘साक्षात्कार’ । भोग में है तो भोगी भोग से मिलता है। त्याग में है तो त्यागी त्याग करता है। तपस्वी भी लोकांतर में सुख से मिलता है लेकिन साक्षात्कार का अर्थ है कि ईश्वर ईश्वर से मिले। देवो भूत्वा यजेद् देवम् । निर्वासनिक हो तो तुम ईश्वर हो। निश्चिंत हो तो तुम ईश्वर हो। यदि देह की मैल तुम्हारे में नहीं है और तुम अपने को आत्मभाव से प्रकट कर सको तो तुममें और ईश्वर में फर्क नहीं है। यदि देह के साथ जुड़ गये तो तुम्हारे और ईश्वर में बड़ा फासला है। भोग के साथ जुड़ गये, स्वर्ग के साथ जुड़ गये, धन के साथ जुड़ गये, कुछ पाने के साथ जुड़ गये तो भिखारी हो और कुछ पाने की इच्छा नहीं है, अपने आपको तुमने खो दिया तो समझो साक्षात्कार !

साक्षात्कार का अर्थ है कि कहीं भी मस्त न होना देखा अपने आपको मेरा दिल दीवाना हो गया। न छेड़ो मुझे यारों मैं खुद पे मस्ताना हो गया । खुद पर, अपने आत्मा पर जब चित्त मस्त हो जाय, अपने-आपमें जब आप विश्रांति पाने लगो, आपके आगे स्वर्ग फीका हो जाय, आपके आगे वैकुंठ फीका हो जाय, आपके आगे प्रधानमंत्री का पद तो क्या होता है, इन्द्र-पद, ब्रह्माजी का पद भी फीका हो जाय तो समझो कि साक्षात्कार हो गया। भक्त लोग ब्रह्मा, विष्णु, महेश के लोक में जाते हैं । तपस्वी तप करके स्वर्ग में जाते हैं । साक्षात्कार का अर्थ है कि ब्रह्मा, विष्णु, महेश का जो पद है, वह भी तुच्छ भासने लग जाय । इससे बढ़कर साधना की पराकाष्ठा नहीं हो सकती, इससे बढ़कर कोई उपलब्धि नहीं हो सकती । आत्मसाक्षात्कार आखिरी उपलब्धि है।

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गर्भस्थ शिशु के बौद्धिक विकास के लिए अद्भुत प्रयोग

अद्भुत विद्या प्राप्ति के लिए विद्या लाभ योग 2022

‘ॐ ऐं ह्रीं श्रीं क्लीं वागवादिनी सरस्वती मम जिव्हाग्रे वद वद ॐ ऐं ह्रीं श्रीं क्लीं नमः स्वाहा।’ यह मंत्र २३ जुलाई २०२१ को दोपहर २:२६ से रात्रि ११:४५ के बीच १०८ बार जप लें तथा रात्रि ११ से १२ बजे के बीच जीभ पर लाल चन्दन से ह्रीं मंत्र लिख दें। जिसकी जीभ पर यह मंत्र इस विधि से लिखा जाएगा उसे विद्या लाभ व अद्भुत विद्वता की प्राप्ति होगी। गर्भस्थ शिशु की बुद्धिशक्ति बढ़ाने हेतु गर्भवती माताएं भी यह प्रयोग कर सकती हैं। नवजात शिशु एवं कम वय के बच्चों की माताएं स्वयं जप करके बच्चे की जिव्हा पर लाल चन्दन से ह्रीं मंत्र लिख दें। ( ध्यान दें – यह योग केवल गुजरात व महाराष्ट्र में है।)

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आधुनिक विज्ञान ने भी स्वीकारा…..

आधुनिक विज्ञान ने भी स्वीकारा...

हमारे ऋषि-मुनियों ने खोज करके अनादिकाल से यह बताया हुआ है कि बच्चे को गर्भावस्था में जिस प्रकार के संस्कार मिलते हैं, आगे चलकर वह वैसा ही बन जाता है। ऐसे कई उदाहरण इतिहास में पाये जाते हैं । इस युग में ये बातें लोगों के लिए आश्चर्यजनक थीं लेकिन अब वैज्ञानिकों ने शोधों के द्वारा इस बात को स्वीकार कर लिया है कि बच्चा गर्भावस्था से ही सीखने की शुरुआत कर देता है, खासकर उसे शब्दों का ज्ञान हो जाता है। कुछ शिशुओं पर जन्म के बात परीक्षण किये गये व उनके मस्तिष्क की क्रिया जाँची गयी तो पाया गया कि शिशु के मस्तिष्क ने गर्भावस्था के दौरान सुने हुए शब्दों को पहचानने के तंत्रकीय संकेत दिये।

शोध के मुताबिक गर्भावस्था के दौरान 7वें माह से गर्भस्थ शिशु शब्दों की पहचान कर सकता है और उन्हें याद रख सकता है। इतना ही नहीं, वह मातृभाषा के स्वरों को भी याद रख सकता है। हेलसिंकी विश्वविद्यालय (फिनलैण्ड) के न्यूरोसाइंटिस्ट आयनो पार्टानेन व उनके साथियों ने पाया कि ‘गर्भावस्था में सुनी गयी लोरी को जन्म के चार महीने बाद भी बच्चा पहचानता है या याद रखता है।’गर्भस्थ शिशु पर माँ के खान-पान, क्रियाकलाप, मनोभावों आदि भी प्रभाव पड़ता है और माँ द्वारा की गयी हर क्रिया से बच्चा सीखता है। परंतु उसके सीखने की सीमा को विज्ञान अभी पता लगाने में सक्षम नहीं हो पाया है।

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Valuable Effects Of Classical Music On Pregnant Women

'भारतीय शास्त्रीय संगीत'

शास्त्रीय संगीत और दूसरे संगीत में क्या फर्क है? योग शास्त्र में कहा जाता है – नाद ब्रह्म; यानी ध्वनि ही ईश्वर है। ध्वनि इसी समझ से जन्म हुआ है भारतीय शास्त्रीय संगीत का। ऐसा इसलिए कहा जाता है, क्योंकि हमारा शरीर और सारा जगत एक ध्वनि या फिर कंपन ही है। इसका अर्थ है कि अलग-अलग तरह की ध्वनियाँ हम पर अलग-अलग तरह के असर डाल सकती हैं। अगर आप ऐसे लोगों को गौर से देखेंगे जो शास्त्रीय संगीत से गहराई से जुड़े हैं, तो आपको लगेगा कि वे स्वाभाविक रूप से ही ध्यान की अवस्था में रहते हैं। इसलिए इस संगीत को महज मनोरंजन के साधन के तौर पर ही नहीं देखा गया, बल्कि यह आध्यात्मिक प्रक्रिया के लिए एक साधन की तरह था।तनाव पूर्ण जीवन शैली में मानसिक तनाव से बचना बहुत कठिन है परंतु इससे छुटकारा पाने का सबसे प्रभावशाली एवं सशक्त माध्यम है- ‘भारतीय शास्त्रीय संगीत’

संगीत और गर्भावस्था

संगीत चिकित्सा से ये अनुभव किया गया है कि संगीत महिलाओं  के लिए गर्भावस्था के पूरे नौ माह बहुत लाभदायक होता है। गर्भावस्था के दौरान शास्त्रीय संगीत सुनने से गर्भिणी के स्वास्थ्य पर अच्छा परिणाम देखने को मिलता है तथा संगीत के प्रभाव से अपरिपक्व शिशु अधिक तेजी से बढ़ने लगता है। विभिन्न वैज्ञानिकों ने रिसर्च किया संगीत से मलेरिया, अनिद्रा, मिर्गी, क्षय रोग, रक्तचाप, डीप्रेशन जैसे अनेक बीमारियों से छुटकारा मिल सकता है। इसीलिए शास्त्रीय  संगीत को एक दर्द निवारक औषधि भी मानते हैं ।

संगीत और स्वास्थ्य

एक रिसर्च सेंटर के वैज्ञानिक ज्ञान प्रकाश यादव कहते हैं कि रागों से हार्मोन्स कंट्रोल किये जा सकते हैं। पाश्चात्य जगत में प्रसिद्ध रॉक संगीत (Rock Music) बजाने वाले और सुनने वाले की जीवन शक्ति क्षीण होती है है। डॉ. डायमण्ड ने प्रयोगों से सिद्ध किया कि सामान्यतया हाथ का एक स्नायु ‘डेल्टोइड’ 40 से 45 कि.ग्रा. वजन उठा सकता है। जब रॉक संगीत (Rock Music) बजता है तब उसकी क्षमता केवल 10 से 15 कि.ग्रा. वजन उठाने की रह जाती है। इस प्रकार रॉक म्यूज़िक से जीवन-शक्ति का ह्रास होता है और अच्छे, सात्त्विक और पवित्र संगीत की ध्वनि से एवं प्राकृतिक आवाजों से जीवन शक्ति का विकास होता है ।

संगीत न केवल आत्मा बल्कि मन व शरीर को सही पोषण देने के लिए एक बड़ा माध्यम है।

यदि शास्त्रीय संगीत के साथ भगवान का नाम जोड़ दिया जाए तो उसका दुगुना फायदा होता है। आपके मन को शांति मिलेगी, बीमारियों से छुटकारा मिलेगा और भगवान का नाम जपने से पुण्य भी प्राप्त होगा। भगवन नाम जप की महिमा अनंत है, भगवान के नाम का जप सभी विकारों को मिटाकर दया, क्षमा, निष्कामता आदि दैवीय गुणों को प्रकट करता है। भगवन-नाम जप मात्र से दुःख, चिंता, भय, शोक, रोग आदि निवृत्त होने लगते हैं। मनुष्य के अनेक पाप-ताप भस्म होने लगते हैं, उसका हृदय शुद्ध होने लगता है।

सुनिये कैसे पूज्य बापुजी भी शास्त्रीय संगीत का महत्व बता रहे हैं :-

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परदुःखकातरता व सच्चाई

परदुःखकातरता व सच्चाई

गाँधी जी का बाल्यकाल बड़ा ही प्रेरणादायक रहा है। उनके जीवन में बचपन से लेकर अंतिम क्षणों तक अनेकों ऐसे संस्मरण हैं, जिनसे प्रत्येक व्यक्ति कुछ-न-कुछ सीख सकता है। गाँधी जी का बचपन का नाम मोहनदास था। मोहनदास अपने पिता की खूब सेवा करते थे। विद्यालय का समय पूरा होने पर वे सीधा घर आ जाते और पिता की सेवा में लग जाते।

एक बार उनके पिताजी श्री करमचंद गाँधी बीमार पड़ गये। मोहनदास उन्हें समय पर दवा देते, हर प्रकार की देखरेख करते और रात को सोते समय देर तक पाँव दबाते। पिताजी उनकी सेवा से खूब प्रसन्न थे और स्नेहभरे आशीर्वाद दिया करते थे।

एक बार मोहनदास घर में बैठकर पढ़ाई कर रहे थे। उनके भाई ने आकर उन्हें बताया कि उस पर 25 रूपये उधार हो गये हैं। इस कर्जे को चुकाने के लिए वह मोहनदास की मदद चाहता था। मोहनदास के पास पैसे तो थे नहीं, वे देते कैसे ? अंततः उन्होंने एक तरकीब निकाली। रात्रि के समय मोहनदास ने अपने दूसरे भाई के बाजूबंद में से थोड़ा-सा सोना निकाल लिया और उसे सुनार के यहाँ बेचकर 25 रूपये भाई को दे दिये। इस प्रकार उनका भाई तो कर्जमुक्त हो गया परंतु चोरी करने के अपराध से मोहनदास का दिल दबा-दबा सा रहने लगा। भोजन, खेलकूद, पढ़ाई आदि सभी क्रियाओं से उनका मन उचाट हो गया। वे बेचैन हो उठे। उन्होंने अपने पिता जी को एक पत्र लिखा और धीरे से उन्हें पकड़ा दिया व पास ही पलंग पर स्वयं बैठ गये। पत्र में मोहनदास ने अपनी गलती स्वीकार की थी और पिताजी से कठोर-से-कठोर दंड देने का निवेदन किया था। पिताजी ने उनका पत्र पढ़ा। पत्र पढ़ते-पढ़ते उनकी आँखों से आँसू बहने लगे। उन्हें अपने सुयोग्य पुत्र पर गर्व हो रहा था। ये आँसू मोहनदास की सच्चाई का प्रमाण दे रहे थे। पिता की अश्रुधारा ने मोहन के हृदय की मैल को धो बहाया। अपनी सच्चाई, ईमानदारी और परदुःखकातरता के कारण यही बालक आगे चलकर महात्मा गाँधी के नाम से प्रसिद्ध हुआ।

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गर्भस्थ शिशु को सुसंस्कारी बनाने तथा उसके उचित पालन-पोषण की जानकारी देने हेतु पूज्य संत श्री आशारामजी बापू द्वारा प्रेरित महिला उत्थान मंडल द्वारा लोकहितार्थ दिव्य शिशु संस्कार अभियान प्रारंभ किया गया है ।