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नारी-समाज को पुन: अपनी महिमा से अवगत करने, उसके सर्वांगीण विकास का मार्गदर्शन करने तथा मनुष्य जीवन के वास्तविक उद्देश्य भगवतप्राप्ति के प्रति सजग करने के लिए विश्ववंदनीय ब्रह्मनिष्ठ महापुरुष पूज्य संत श्री आशारामजी बापू की पावन प्रेरणा एवं मार्गदर्शन में ‘महिला उत्थान मंडल’ का गठन किया गया जिसके जिसके अन्तर्गत गर्भस्थ शिशु को सुसंस्कारी बनाने तथा उसके उचित पालन-पोषण की जानकारी देने हेतु पूज्य संत श्री आशारामजी बापू द्वारा प्रेरित महिला उत्थान मंडल द्वारा लोकहितार्थ दिव्य शिशु संस्कार अभियान प्रारंभ किया गया है ।

विचारशक्ति की गरिमा

विचारशक्ति की गरिमा

किसान अपने खेत में उत्तम प्रकार की फसल पैदा करने के लिए रात-दिन मेहनत करता है। वर्षा से पूर्व जमीन जोतकर खाद डाल के तैयार करता है। वर्षा आने पर खेत में बहुत सावधानी से उत्तम प्रकार के बीज बोता है व फसल तैयार होने तक उसका खूब ध्यान रखता है परंतु ऐसा ध्यान संतानप्राप्ति के संदर्भ में मनुष्य नहीं रखता।

कुम्हार मिट्टी को जैसा चाहे वैसा आकार दे सकता है परंतु आँवे में पक जाने पर उसके आकार में चाहकर भी परिवर्तन नहीं कर सकता। ठीक इसी प्रकार माँ के गर्भ में शिशु के शरीर का निर्माण हो जाने पर एवं उसके दिमाग की विविध शक्तियों का उत्तम या कनिष्ठ बीज प्रस्थापित हो जाने के बाद, उसके अंतःकरण में सद्गुण या दुर्गुणों की छाप दृढ़ता से स्थापित हो जाने के बाद शारीरिक-मानसिक उन्नति में पाठशाला, महाशाला एवं विविध प्रकार के प्रशिक्षण इच्छित परिणाम नहीं ला पाते। माँ के आहार-विहार व विचारों से गर्भस्थ शिशु पोषित व संस्कारित होता है।

इसलिए हे माताओ ! पूज्य बापूजी के बताये अनुसार अपनी सुषुप्त आत्मशक्ति को जगाओ। जगत में कुछ भी असम्भव नहीं है। प्रत्येक मनुष्य अपने यहाँ श्रीरामचन्द्रजी, श्रीकृष्ण, अर्जुन, महात्मा बुद्ध, महावीर स्वामी, कबीरजी, तुलसीदास जी, गार्गी, मदालसा, मीराबाई, शिवाजी, गाँधी जी जैसी महान विभूतियों को जन्म दे सकता है। प्रत्येक दम्पत्ति को गम्भीरता से सोचना चाहिए कि अपनी लापरवाही से अयोग्य शिशु उत्पन्न करना समाज व राष्ट्र के लिए कितना अहितकारी साबित हो सकता है। आप अपने मन की भूमिका सच्चे संतों का सान्निध्य-लाभ लेकर उन्नत बनाइये एवं दृढ़ता से शास्त्रोक्त नियमों का पालन कर उच्च आत्माएँ आपके यहाँ जन्म लें ऐसे श्रेष्ठ सद्गृहस्थ बन जाइये। इससे आपके यहाँ तेजस्वी, सदाचारी, उद्यमी, स्वधर्मपरायण, हितैषी शिशुओं का जन्म होगा।

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कोरोना वायरस से गर्भवती की सुरक्षा

कोरोना वायरस से गर्भवती की सुरक्षा

कोरोना वायरस से ग्रस्त व्यक्ति जो खांसी करता है या नाक के द्वारा बूंदों को बाहर निकालता है, यदि उन बूंदों में अन्य व्यक्ति सांस लेते हैं तो वे भी कोरोना वायरस का शिकार हो सकते हैं । रोगी व्यक्ति की खांसी या साँस के साथ ये बूंदें चारों ओर की वस्तुओं और सतहों पर उतरती हैं । अन्य लोग इन वस्तुओं या सतहों को छूकर, फिर स्वयं की आंखों, नाक या मुंह को स्पर्श करके कोरोना वायरस से संक्रमित होते हैं ।

 

अलग रहना (isolation) – अत: स्वयं तथा शिशु की रक्षा हेतु गर्भवती माताओं के लिए अलग रहना (isolation) सर्वोपरि उपाय है । हाथों की सफाई, मास्क का उपयोग आदि अन्य सावधानियों के साथ-साथ अपनी रोग-प्रतिकारक शक्ति को बढ़ाने में तत्पर रहें ।

​गौ-चंदन धूपबत्ती – गौ-चंदन धूपबत्ती जलाकर नियमित प्राणायाम करें । धूपबत्ती पर घी डालें तो अच्छा । प्राणायाम करते समय तुलसी जी का पौधा पास में रखें तो और अच्छा है । हो सके तो घी का दिया जलाएं ।
सूर्यस्नान – ‘सूर्यस्नान’ अवश्य करें, अगर आपका श्वसन-तंत्र मजबूत होगा तो यह वायरस आप पर आक्रमण नहीं कर सकता ।

 

 

​ओंकार कीर्तन – पूज्य गुरुदेव की अमृतवाणी में ‘ओंकार कीर्तन’ घर में चालू रखें । स्वयं भी ओंकार का जप करें ।
रक्षाकवच – सुबह-शाम की संध्या में ओंकार का दीर्घ उच्चारण करते हुए अपने इर्द-गिर्द ‘सुरक्षा-कवच’ का निर्माण करें और गर्भ की सुरक्षा के लिए प्रार्थना करें ।

गोमूत्र या गोमूत्र अर्क – घर में गौमूत्र का छिड़काव करें व गौमूत्र से पोछा लगाएं । इस हेतु गोमूत्र अर्क अथवा गोमूत्र से निर्मित पवित्रता लानेवाले गौ शुद्धि सुगंध (फिनायल) का भी उपयोग कर सकते हैं ।

एक चम्मच गोमूत्र पानी में डालकर घर में पोंछा आदि किया जाए । फिनायल तो जीवाणुओं को मारता है, पवित्रता नहीं लाता परंतु गोमूत्र तो जीवाणुरहित करते हुए पवित्रता लाता है । (गोमूत्र अर्क अथवा गोमूत्र से निर्मित पवित्रता लानेवाले गौ शुद्धि सुगंध (फिनायल) का भी उपयोग कर सकते हैं ।)

गोबर के कंडे का प्रयोग – गाय के गोबर के कंडे का टुकड़ा जलाकर धुआँ करें । उस पर घी की बूँदें, चावल व जरा-सा कपूर का टुकड़ा डाल दें । आपके घर के दोषों को, कुप्रभाव को वह धूप ऐसा भगायेगा जैसे सूरज अँधियारे को भगाये । इससे 64,000 घन फीट क्षेत्र के वायरस के कीटाणु और हानिकारक बैक्टीरिया समाप्त हो जाते हैं एवं आपके विचारों में जो हीनता-खिन्नता है वह हट जायेगी और विचारों में प्रसन्नता व सात्विकता थोड़े ही दिनों में आ जायेगी ।

गूगल धूप – त्रिकाल संध्या में गोबर के कंडे जलाकर उसपर ‘गूगल धूप’ डालकर धूप करें । गूगल का धूप जहाँ होता है वहाँ से रोग के कीटाणु व परमाणु भाग जाते हैं ।

धूप करने हेतु कंडों पर कपूर, नीम, बेल, तुलसी जी के सूखे पत्ते या लकड़ी, सरसों, हींग, जौ, चावल व हल्दी भी डाल सकते हैं ।

नीम के पत्ते, फल, फूल, डाली, जड़ – इन पाँचों चीजों को देशी घी के साथ मिश्रित करके घर में धूप किया जाय तो रोगी को तत्काल आराम मिलता है, वातावरण में रोगप्रतिकारक शक्ति सर्जित हो जाती है ।

शंख – हानिकारक वायरस, कीटाणु संध्या के समय शंख बजाने से नष्ट होते हैं ।

आरती – कपूर और आरती का उपयोग करनेवालों के घरों में ऐसे कीटाणुओं का, हल्की आभा का प्रभाव नहीं टिक सकता है ।

स्वच्छता – हाथ-पैर साबुन से धोए बिना घर में प्रवेश न करें । घर में आने के बाद भी सर्वप्रथम स्नानघर में जाकर कपड़ों को पानी में भिगोकर फिर सिर से स्नान करने के बाद ही घर की अन्य वस्तुओं को स्पर्श करें ।

अत्यावश्यक काम के लिए घर से बाहर जाना पड़े तो नाक व मुँह को सूती वस्त्र से बाँध दें । कपूर व तुलसी के पत्तों की पोटली बनाकर उसे सतत् सूँघते रहें । हाथ का स्पर्श चेहरे पर न होने दें ।

पंचामृत – ‘पंचामृत’ का नियमित सेवन रोग प्रतिकारक शक्ति को बढ़ाएगा ।

सावधानी जरुर रखें परन्तु भयभीत न हो ।

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शिशु की रक्षा के लिए रक्षाकवच

शिशु की सुरक्षा के लिए रक्षा-कवच

माता यदि गर्भकाल में रक्षा-कवच (आध्यात्मिक तरंगों का आभामंडल) बनाती है तो उस पर बाह्य हलके वातावरण व भूत-प्रेत, बुरी आत्माओं का प्रभाव नहीं पड़ता। साथ ही गर्भस्थ शिशु के आसपास भी सकारात्मक ऊर्जा से सम्पन्न आभामंडल विकसित होता है।

रक्षा-कवच धारण करने की विधिः प्रातः और सायं के संध्या-पूजन से पहले या बाद में उत्तर या पूर्व दिशा की ओर मुँह करके कम्बल आदि गर्म आसन पर सुखासन, पद्मासन या सिद्धासन में बैठे। मेरुदंड सीधा हो। आँखें आधी खुली, आधी बन्द रखे। गहरा श्वास लेकर भीतर रोक के रखे। ‘ॐ’ या अपने इष्टमंत्र अथवा अपने गुरुमंत्र का जप करते हुए दृढ़भावना करे कि ‘मेरे इष्ट की कृपा का शक्तिशाली प्रवाह मेरे अंदर प्रवेश कर रहा है और मेरे चारों ओर सुदर्शन चक्र सा एक इन्द्रधनुषी प्रकाश घना होता जा रहा है, दुर्भावनारूपी अंधकार विलीन हो गया है। सात्त्विक प्रकाश-ही-प्रकाश छाया है। सूक्ष्म आसुरी शक्तियों से मेरी रक्षा करने के लिए वह रश्मिल चक्र सक्रिय है। मैं पूर्णतः निश्चिंत हूँ।’ ऐसा एक मानसिक चित्र बना ले।

श्वास जितनी देर भीतर रोक सके, रोके। मन-ही-मन उक्त भावना को दोहराये। अब धीरे-धीरे ‘ॐ….’ का दीर्घ उच्चारण करते हुए श्वास बाहर निकाले और भावना करे कि ‘मेरे सारे दोष, विकार भी बाहर निकल रहे हैं। मन-बुद्धि शुद्ध हो रहे हैं।’ श्वास खाली होने के बाद तुरंत श्वास न ले। यथाशक्ति बिना श्वास रहे और भीतर-ही-भीतर ‘हरि ॐ…. हरि ॐ….’ या इष्टमंत्र का मानसिक जप करे। ऐसे 10 प्राणायाम के साथ उच्च स्वर से ‘ॐ….’ का गुंजन करते हुए इन्हीं दिव्य विचारों-भावनाओं से अपने चहुँओर इन्द्रधनुषी आभायुक्त प्राणमय सुरक्षा-कवच को प्रतिष्ठित करे, फिर शांत हो जाय, सब प्रयास छोड़ दे। कुछ सप्ताह ऐसा करने से आपके रोमकूपों से जो आभा निकलेगी उसका एक रक्षा-कवच बन जायेगा। जो आपके गर्भ को सुरक्षित रखेगा।

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गर्भस्थ शिशु पर संस्कारों का प्रभाव

गर्भस्थ शिशु पर संस्कारों का प्रभाव

गर्भावस्था में शिशु व माता का बहुत ही प्रगाढ़ संबंध होता है । माता के पेट में शिशु 9 माह गुजारता है । इस अवधि में शिशु को एक अति कोमल नाल के द्वारा माता के श्वास से श्वास तथा भोजन से पोषण मिलता रहता है । इस दौरान स्वाभाविक ही माता के शारीरिक, मानसिक व नैतिक स्थिति का प्रभाव गर्भस्थ शिशु पर पड़ता है ।

कुछ ऐतिहासिक दृष्टांत इसके प्रमाण हैं :- अभिमन्यु ने माता के गर्भ में रहते हुए ही चक्रव्यूह में प्रवेश करने की कला पिता द्वारा सुनी । गर्भस्थ अभिमन्यु पर इस विवरण का इतना प्रभाव पड़ा कि ‘महाभारत’ के भीषण युद्ध में गर्भावस्था में जानी हुई विद्या का उपयोग करके वह दुर्भेद्य चक्रव्यूह में प्रवेश कर गया । इस प्रकार जन्म के बाद भी उसे चक्रव्यूह में प्रवेश करने की युक्ति याद थी । राक्षसराज हिरण्यकशिपु का पुत्र प्रह्लाद महान भक्त कैसे हुआ ? गर्भावस्था में देवर्षि नारदजी ने माता कयाधू को ज्ञान-भक्ति का उपदेश दिया था । उसका प्रभाव गर्भस्थ प्रह्लाद पर पड़ा । इसलिए पिता ईश्वरद्रोही होते हुए भी पुत्र महान भक्त हुआ । हिरण्यकशिपु ने प्रह्लाद को अनेक प्रकार के भय दिखाये व सजाएँ दीं किंतु प्रह्लाद में सत्संग के वे संस्कार इतने दृढ़ हो गये थे कि भयंकर सजाएँ भी प्रह्लाद को ईश्वरभक्ति के मार्ग से डिगा नहीं सकीं । नेपोलियन बोनापार्ट को युद्ध की शिक्षा गर्भावस्था में मिली थी । सगर्भावस्था में उसकी माता को घुड़सवारी व युद्ध करने पड़ते थे । कई बार तो घोड़े पर ही रात्रि-विश्राम लेना पड़ता था । एक जगह से दूसरी जगह घोड़े पर ही भागते रहना पड़ता था ।

सन् 1804 में केबोट गाँव में एक छः वर्षीय बालक में असाधारण स्मृतिशक्ति पायी गयी । वह पाँच अंकों का गुणन तुरंत मुँह-जबानी कर देता था । उसमें ऐसी विलक्षण प्रतिभा के जगने का कारण यह था कि उसकी माता को कपड़ों पर अलग-अलग आकृतियाँ बनाने के लिए ताने-बाने बड़ी सूक्ष्मता से गिनने पड़ते थे । सगर्भावस्था के दौरान एक बार एक आकृति बनाने के लिए उसकी दिन-रात की सब कोशिशें निष्फल हो गयीं । इस दौरान मस्तिष्क को असाधारण परिश्रम पड़ा । रात जगने पर भी सफलता न मिलने से वह निराश होकर काम छोड़ने ही वाली थी, तभी अचानक उसके मन में हुआ कि कुछ ताने-बाने इस प्रकार बुनें तो यह आकृति बन सकती है । उन विचारों का गहरा असर गर्भस्थ शिशु पर पड़ा और उस बालक में असाधारण क्षमता का विकास हुआ । इस प्रकार माता-पिता के आचार-विचार का असर गर्भस्थ शिशु पर पड़ता ही है । अतः गर्भिणी माताएँ अधिक-से-अधिक सत्संग-श्रवण व भगवन्नाम-जप करते हुए भगवद्-चिंतन करें ।

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गर्भस्थ शिशु को सुसंस्कारी बनाने तथा उसके उचित पालन-पोषण की जानकारी देने हेतु पूज्य संत श्री आशारामजी बापू द्वारा प्रेरित महिला उत्थान मंडल द्वारा लोकहितार्थ दिव्य शिशु संस्कार अभियान प्रारंभ किया गया है ।